मानसिक स्वास्थ्य और महर्षि पतंजलि के ‘पंच क्लेश’ | आयुष्य पथ

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ मनुष्य ने भौतिक सुख-सुविधाओं के असीमित साधन जुटा लिए हैं, वहीं उसका मन सबसे अधिक अशांत और बीमार हो चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़े बताते हैं कि आज दुनिया की एक बड़ी आबादी अवसाद (Depression), चिंता (Anxiety) और तनाव (Stress) से जूझ रही है। आधुनिक मनोविज्ञान और मनोरोग विज्ञान (Psychiatry) इन समस्याओं का समाधान खोजने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च कर रहे हैं, नई-नई दवाइयाँ और थेरेपी विकसित की जा रही हैं। लेकिन, क्या इन आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के पास मानसिक रोगों का कोई स्थायी और जड़ से समाप्त करने वाला समाधान है?
जब हम अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख, देव संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और प्रख्यात चिकित्सक परम श्रद्धेय डॉ. प्रणव पंड्या जी की कालजयी कृति ‘मानसिक स्वास्थ्य और योग’ का अध्ययन करते हैं, तो हमें एक नई दृष्टि मिलती है। डॉ. पंड्या जी स्पष्ट करते हैं कि आधुनिक मनोरोगों (Psychosomatic Disorders) का असली कारण केवल मस्तिष्क के रसायनों (Chemical Imbalance) में नहीं, बल्कि मानव के अंतःकरण (चित्त) में गहराई तक जमे उन विकारों में छिपा है, जिन्हें महर्षि पतंजलि ने हजारों वर्ष पूर्व अपने ‘योग सूत्र’ में ‘पंच क्लेश’ के रूप में परिभाषित किया था।
महर्षि पतंजलि साधन पाद के तीसरे सूत्र में कहते हैं:
“अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥” (योग सूत्र २.३)
अर्थात— अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश; ये पाँच क्लेश ही मनुष्य के सभी दुखों और मानसिक रोगों का मूल कारण हैं। मानसिक स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ केवल ‘बीमारी का न होना’ नहीं है, बल्कि चित्त का इन पाँचों क्लेशों से मुक्त होकर अपनी सहज आत्मिक शांति में स्थित होना है। आइए, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के आलोक में इन पंच क्लेशों की विस्तृत और वैज्ञानिक विवेचना करें।
1. अविद्या (Avidya) – आत्म-विस्मृति और मूल अज्ञान
महर्षि पतंजलि के अनुसार, अविद्या सभी क्लेशों की जननी (प्रसूति भूमि) है। योग दर्शन में अविद्या का अर्थ केवल स्कूली शिक्षा का अभाव या कोई साधारण ‘गलत सोच’ नहीं है। अविद्या का शाब्दिक अर्थ है— अनित्य (नश्वर) को नित्य (शाश्वत) मान लेना, अपवित्र को पवित्र मान लेना, दुख को सुख मान लेना और अनात्मा (शरीर/जड़) को ही आत्मा (चेतन) मान लेना।
डॉ. प्रणव पंड्या जी के अनुसार, अविद्या एक प्रकार की ‘आत्म-विस्मृति’ (Spiritual Amnesia) है। जब मनुष्य अपनी ईश्वरीय प्रकृति (Divine Nature) को भूलकर, स्वयं को केवल हाड़-मांस का शरीर (Body-consciousness) मान लेता है, तो यहीं से जीवन के सारे मानसिक संतापों की शुरुआत होती है।

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
आधुनिक मनोविज्ञान में जिसे ‘कॉग्निटिव डिस्टॉर्शन’ (Cognitive Distortion) कहा जाता है, वह अविद्या का ही एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। जब मनुष्य संसार के नश्वर पदार्थों (जैसे धन, यौवन, सत्ता) को स्थायी मानकर उन पर अपना पूरा जीवन केंद्रित कर देता है, और जब वे वस्तुएं नष्ट होने लगती हैं या छिन जाती हैं, तो व्यक्ति गहरे मानसिक आघात (Trauma) का शिकार होता है। अविद्या के कारण ही व्यक्ति यह भूल जाता है कि वह एक अनंत चेतना है। यह अज्ञानता ही मन में एक ऐसा खालीपन पैदा करती है, जिसे दुनिया का कोई भी भौतिक सुख भर नहीं सकता। इसी खालीपन से तनाव और अवसाद का जन्म होता है।
2. अस्मिता (Asmita) – देहाभिमान और झूठे अहंकार का भ्रम
योग सूत्र में अस्मिता को परिभाषित करते हुए कहा गया है— दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता। अर्थात, दर्शन शक्ति (चेतन आत्मा) और दर्शन साधन (जड़ बुद्धि या शरीर) को एक मान लेना अस्मिता है। सरल शब्दों में, अस्मिता वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान भूलकर अपनी बुद्धि, पद, प्रतिष्ठा, सौंदर्य, बैंक बैलेंस या सामाजिक दर्जे को ही अपना ‘स्व’ (True Self) मान बैठता है।
डॉ. पंड्या जी एक चिकित्सक के दृष्टिकोण से समझाते हैं कि यह ‘झूठा अहंकार’ (False Ego) मनुष्य के स्नायु तंत्र (Nervous System) पर कितना भयानक दबाव डालता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
समाज में अपनी एक विशिष्ट छवि (Image) बनाए रखने की जद्दोजहद ही अस्मिता है। जब किसी व्यक्ति के इस झूठे अहंकार पर चोट लगती है—जैसे बॉस द्वारा डांट पड़ना, व्यापार में घाटा होना, या सोशल मीडिया पर अपेक्षित ‘लाइक्स’ न मिलना—तो व्यक्ति का नर्वस सिस्टम तुरंत ‘फाइट या फ्लाइट’ (Fight or Flight) मोड में चला जाता है। एंडोक्राइन ग्रंथियां (Endocrine glands) कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हार्मोन का अत्यधिक स्राव करने लगती हैं।
अस्मिता से ग्रसित व्यक्ति हमेशा एक हीन भावना (Inferiority Complex) या श्रेष्ठता ग्रंथि (Superiority Complex) के बीच झूलता रहता है। वह कभी भी सहज नहीं रह पाता। मनोवैज्ञानिक रूप से, अस्मिता ही व्यक्ति को ‘ईगो डिप्रेशन’ और ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ (Identity Crisis) की ओर धकेलती है।
3. राग (Raga) – इन्द्रिय-लोलुपता और प्राण-ऊर्जा का क्षरण
महर्षि पतंजलि कहते हैं— सुखानुशयी रागः। सुख के अनुभवों के पीछे अंधी दौड़ लगाना, उन सुखद स्मृतियों से चिपक जाना और उन्हें बार-बार प्राप्त करने की तीव्र लालसा ही ‘राग’ है।
डॉ. प्रणव पंड्या जी के वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की दृष्टि में, राग केवल इच्छा नहीं है, बल्कि यह एक भयंकर ‘आसक्ति’ (Attachment) है। जब व्यक्ति सांसारिक सुखों (Materialistic pleasures) और इन्द्रिय-भोगों (जिह्वा का स्वाद, कामवासना, विलासिता) का दास बन जाता है, तो उसके भीतर संचित बहुमूल्य ‘प्राण-ऊर्जा’ (Prana Energy) का तेजी से क्षरण होने लगता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
आधुनिक न्यूरोबायोलॉजी (Neurobiology) के अनुसार, राग मस्तिष्क के ‘डोपामीन रिवॉर्ड सिस्टम’ (Dopamine Reward System) का एक असंतुलन है। जब हम किसी सुखद वस्तु का भोग करते हैं, तो मस्तिष्क डोपामीन छोड़ता है। लेकिन राग के कारण, व्यक्ति को उसी सुख की प्राप्ति के लिए बार-बार अधिक मात्रा में उस वस्तु की आवश्यकता होती है।
आज के युग की सभी प्रकार की लत (Addictions)—चाहे वह शराब हो,插图, जंक फूड हो, या स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की लत हो—इसी ‘राग’ का साक्षात प्रमाण हैं। इच्छाओं की कभी न बुझने वाली यह प्यास मानसिक हताशा (Frustration) पैदा करती है। जब व्यक्ति को उसकी इच्छित वस्तु नहीं मिलती, तो उसका यह राग ही भयंकर ‘क्रोध’ और ‘चिंता’ (Anxiety) में बदल जाता है।
4. द्वेष (Dvesha) – असहिष्णुता, क्रोध और विषाक्त भावनाएं
दुःखानुशयी द्वेषः। दुःख या पीड़ा देने वाले अनुभवों, व्यक्तियों या परिस्थितियों से दूर भागना, उनके प्रति तीव्र घृणा और क्रोध का भाव रखना ही ‘द्वेष’ है। जीवन में अप्रिय स्थितियों का आना अत्यंत स्वाभाविक है, लेकिन द्वेष ग्रस्त मन उन स्थितियों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता।
डॉ. पंड्या जी अपनी पुस्तक में द्वेष के शारीरिक और मानसिक प्रभावों का बहुत ही सूक्ष्म और चिकित्सकीय विश्लेषण करते हैं। वे इसे सीधे ‘साइको-न्यूरो-इम्यूनोलॉजी’ (Psycho-neuro-immunology) से जोड़ते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
जब हम किसी के प्रति द्वेष, प्रतिशोध (Revenge), या ईर्ष्या (Jealousy) की भावना पालते हैं, तो वह भावना सामने वाले को बाद में, लेकिन हमारे अपने ही शरीर और मन को पहले जलाती है। मनोविज्ञान में इसे ‘अवॉइडेंस बिहेवियर’ (Avoidance Behavior) और ‘सप्रेस्ड इमोशन्स’ (Suppressed Emotions) कहा जाता है।
दबा हुआ क्रोध और द्वेष हमारे रक्त में विष (Toxins) घोल देते हैं। यही विषाक्त भावनाएं (Toxic Emotions) उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure), पेट के अल्सर (Ulcers), माइग्रेन और यहां तक कि हृदय रोग जैसी गंभीर मनोकायिक बीमारियों (Psychosomatic Diseases) को जन्म देती हैं। जो व्यक्ति हमेशा द्वेष से भरा रहता है, उसका मन कभी शांत नहीं हो सकता। उसके भीतर छिपे फोबिया (Phobias) और पीटीएसडी (PTSD) जैसी समस्याएं इसी द्वेष का विकसित रूप हैं।
5. अभिनिवेश (Abhinivesha) – प्राण-भय और असुरक्षा की गहरी ग्रंथि
पंच क्लेशों में अंतिम और सबसे गहरा क्लेश है— अभिनिवेश। महर्षि पतंजलि कहते हैं— स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः। मृत्यु का भय या अपने अस्तित्व के नष्ट होने का अज्ञात डर अभिनिवेश है। यह डर इतना स्वाभाविक और गहरा है कि साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या, बड़े-बड़े विद्वानों और ज्ञानियों में भी यह जन्मजात रूप से विद्यमान रहता है।
डॉ. प्रणव पंड्या जी अभिनिवेश को मनुष्य की प्राण-ऊर्जा की सबसे बड़ी ‘लीकेज’ (Leakage) मानते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
आधुनिक मनोविज्ञान में अभिनिवेश को ‘एग्जिस्टेंशियल एंग्जायटी’ (Existential Anxiety) या अस्तित्व का संकट कहा जाता है। आज का मनुष्य हर पल एक अज्ञात भय और असुरक्षा (Insecurity) के साये में जी रहा है। नौकरी जाने का डर, प्रियजनों को खोने का डर, बुढ़ापे का डर, बीमारी का डर और अंततः मृत्यु का डर।
यह निरंतर बना रहने वाला भय (Chronic Fear) व्यक्ति की जीवनी शक्ति (Vitality) को भीतर ही भीतर सुखा देता है। इसके कारण उसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) नष्ट हो जाती है। अचानक होने वाले ‘पैनिक अटैक’ (Panic Attacks), अत्यधिक पसीना आना, घबराहट होना, ये सब इसी गहरे छिपे हुए अभिनिवेश क्लेश के मनोवैज्ञानिक and शारीरिक लक्षण हैं। जब व्यक्ति अपने शरीर को ही सब कुछ मान बैठता है (अविद्या), तो उस शरीर के नष्ट होने का विचार ही उसे सिहरा देता है।
‘आधि’ से ‘व्याधि’ तक की यात्रा
योग वशिष्ठ और आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में उत्पन्न होने वाले अधिकांश रोग वास्तव में मन से उत्पन्न होते हैं। चित्त में मौजूद ये पाँच क्लेश पहले मानसिक स्तर पर हलचल पैदा करते हैं, जिसे ‘आधि’ (Primary Disease of Mind) कहा जाता है। जब यह मानसिक तनाव, अविद्या और राग-द्वेष लंबे समय तक बने रहते हैं, तो ये स्नायु तंत्र और प्राण प्रवाह (Pranic flow) को बाधित कर देते हैं। प्राण के इसी असंतुलन के कारण अन्नमय कोष (Physical body) में बीमारियाँ प्रकट होने लगती हैं, जिसे ‘व्याधि’ (Somatic Disease) कहा जाता है।
आधुनिक मेडिकल साइंस में जिन ऑटो-इम्यून बीमारियों, हृदय रोगों, मधुमेह (Diabetes) और थायराइड को ‘लाइफस्टाइल डिजीज’ कहकर छोड़ दिया जाता है, वास्तव में वे सब इन्हीं पंच क्लेशों के कारण अंतःकरण में उपजी ‘आधि’ का ही स्थूल रूप (व्याधि) हैं।
योग: क्लेशों को दग्ध करने की अंतिम चिकित्सा
अब प्रश्न उठता है कि इन पंच क्लेशों से मुक्ति कैसे पाई जाए? क्या केवल कुछ गोलियां (Antidepressants) खाकर अविद्या या अस्मिता को नष्ट किया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। गोलियां केवल मस्तिष्क के रिसेप्टर्स को कुछ समय के लिए सुन्न (Numb) कर सकती हैं, लेकिन वे क्लेश रूपी बीजों को नष्ट नहीं कर सकतीं।
यहीं पर योग अपनी पूर्ण वैज्ञानिकता के साथ प्रकट होता है। डॉ. प्रणव पंड्या जी स्पष्ट करते हैं कि योग का उद्देश्य केवल शरीर को लचीला बनाना या कुछ आसनों का प्रदर्शन करना नहीं है। अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) का वास्तविक उद्देश्य इन क्लेशों को ‘दग्ध बीज’ (भुने हुए बीज) के समान कर देना है, ताकि वे दोबारा दुख रूपी अंकुर पैदा न कर सकें।
- प्राणायाम के माध्यम से प्राण-ऊर्जा को संतुलित कर राग और द्वेष के आवेगों को शांत किया जाता है।
- प्रत्याहार के द्वारा इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी किया जाता, जिससे राग की लत टूटती है।
- ध्यान (Meditation) के अभ्यास से चित्त की वृत्तियां शांत होती हैं, अविद्या का अंधकार मिटता है और साधक को अपने वास्तविक आत्म-स्वरूप (True Self) का दर्शन होता है। जब साधक को यह अनुभव हो जाता है कि वह एक शाश्वत चेतना है, तो मृत्यु का भय (अभिनिवेश) और देहाभिमान (अस्मिता) अपने आप विलीन हो जाते हैं।
निष्कर्ष
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में महर्षि पतंजलि का योग दर्शन और डॉ. प्रणव पंड्या जी का ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ आज की मानव जाति के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। जब तक मनुष्य अपने दुखों का कारण बाहर (परिस्थितियों या दूसरों में) खोजता रहेगा, तब तक वह तनाव ग्रस्त ही रहेगा। वास्तविक शांति तभी प्राप्त होगी जब हम अपने भीतर झांकेंगे और अपने चित्त में बैठे अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश की जड़ों को योग और ध्यान की अग्नि में जलाकर भस्म कर देंगे।
‘आयुष्य पथ’ का यह दृढ़ विश्वास है कि आने वाले समय में योग प्रशिक्षकों और चिकित्सकों को केवल शारीरिक लक्षणों का नहीं, बल्कि व्यक्ति के अंतःकरण का उपचार करना होगा। पूर्ण स्वास्थ्य (Holistic Wellness) की प्राप्ति तभी संभव है जब हम ‘व्याधि’ के साथ-साथ ‘आधि’ (क्लेशों) का भी समूल नाश करें।
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