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प्रत्याहार (Pratyahara): एंग्जायटी व ओवरथिंकिंग दूर करने का प्राचीन योग-विज्ञान

प्रत्याहार: मन और इन्द्रियों को ‘हैक’ करने का प्राचीन विज्ञान

प्रत्याहार (Pratyahara): मन और इन्द्रियों को ‘हैक’ करने का प्राचीन वैज्ञानिक रहस्य

डिजिटल युग में तनाव, एंग्जायटी और ओवरथिंकिंग से बचने का सबसे सटीक और अचूक योग-विज्ञान। जानिए महर्षियों द्वारा बताया गया 18 मर्म स्थलों से जुड़ा प्रत्याहार का वह रहस्य, जिस पर बहुत कम लोग चर्चा करते हैं।

सम्पादकीय: आधुनिक युग की सबसे बड़ी मानसिक बीमारी और उसका अचूक समाधान

आज के इस अति-आधुनिक और डिजिटल युग में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या क्या है? यदि आप गहराई से सोचें, तो वह समस्या न तो शारीरिक है और न ही आर्थिक; वह समस्या है— ‘संवेदी अधिभार’ (Sensory Overload)। हमारी पाँचों इन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) हर सेकंड हजारों सूचनाएं (नोटिफिकेशन, शोर, दृश्य, स्वाद) ग्रहण कर रही हैं और हमारे मस्तिष्क (चित्त) में उड़ेल रही हैं। परिणाम? एंग्जायटी, डिप्रेशन, अनिद्रा और फोकस की कमी।

आधुनिक मनोविज्ञान जिसे आज ‘अटेंशन इकॉनमी’ (Attention Economy) और ‘डिजिटल डिटॉक्स’ (Digital Detox) कह रहा है, हमारे ऋषि-मुनियों ने हज़ारों वर्ष पूर्व उसे ‘प्रत्याहार’ (Pratyahara) के रूप में एक पूर्ण वैज्ञानिक और व्यावहारिक विज्ञान के रूप में स्थापित कर दिया था। अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) का यह पाँचवाँ अंग बाहरी दुनिया और भीतरी दुनिया के बीच का सबसे महत्वपूर्ण ‘पुल’ है। लेकिन विडंबना यह है कि आज योग के नाम पर केवल आसनों (शारीरिक व्यायाम) और प्राणायाम पर ही चर्चा होती है। प्रत्याहार, जो वास्तव में मन को हैक करने की मास्टर-की (Master Key) है, उस पर बहुत कम लोग बात करते हैं।

आइए, आज इस सम्पादकीय के माध्यम से पूर्णतः वैज्ञानिक और सरल ढंग से समझते हैं कि प्रत्याहार क्या है, इसका तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) कैसे काम करता है, और इसे अपने जीवन में कैसे उतारा जा सकता है।

प्रत्याहार क्या है? (What is Pratyahara?)

सरल शब्दों में, “इन्द्रियों का बाहरी विषयों से हटकर चित्त (मन) के अनुकूल हो जाने को प्रत्याहार कहते हैं।”

जब तक हमारी इन्द्रियाँ बाहरी विषयों (रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श) की ओर भागती रहती हैं, तब तक हमारी प्राण ऊर्जा (Vital Energy) बाहर की ओर रिसती रहती है। प्रत्याहार उस प्राण ऊर्जा को बाहर बहने से रोककर भीतर की ओर मोड़ने (अन्तर्मुखी करने) का विज्ञान है। प्राचीन योग ग्रन्थों में इसे बहुत ही सुंदर और वैज्ञानिक रूपकों (Analogies) के माध्यम से समझाया गया है:

1. रानी मक्खी और सेवक मक्खियों का विज्ञान (The Queen Bee Effect)

योग दर्शन का सबसे सटीक उदाहरण मधुमक्खियों का है। जैसे मधुमक्खियों के झुंड में ‘रानी मक्खी’ के बैठने पर सारी सेवक मक्खियाँ बैठ जाती हैं और उसके उड़ने पर सभी उड़ने लगती हैं; ठीक वैसे ही हमारी इन्द्रियाँ चित्त (Mind) के अधीन होकर कार्य करती हैं। जब व्यक्ति यम-नियम, आसन और प्राणायाम के अभ्यास से अपने चित्त को बाहरी विषयों से विरक्त कर लेता है, तब इन्द्रियाँ भी रानी मक्खी (चित्त) का अनुकरण करते हुए अपने बाह्य व्यापार (बाहर भागने की प्रवृत्ति) को रोक देती हैं। चित्त की एकाग्रता के कारण इन्द्रियों की विषयों में प्रवृत्ति न होना ही ‘इन्द्रिय जय’ है।

2. गोधूलि वेला का गो-पालक (The Cowherd Analogy)

जिस प्रकार एक गो-पालक (गाय चराने वाला) पूरे दिन वन में विचरण करती हुई गायों को सायंकाल होने पर इकट्ठा करता है और उन्हें वापस गाँव की ओर (सुरक्षित स्थान पर) ले लौटता है, उसी भाँति विषय रूपी वनों में भटकी और संलिप्त इन्द्रियों को वहाँ से हटाकर वापस भीतर (स्वयं की ओर) मोड़ने का नाम ही प्रत्याहार है।

3. सूर्य और कछुए की वृत्ति (The Sun and the Tortoise)

जैसे तीसरे प्रहर (दोपहर के बाद) में सूर्य अपनी फैली हुई प्रभा (किरणों) को समेटने लगता है, ऐसे ही योगी अपने मन के फैले हुए विकारों को प्रत्याहार द्वारा नियन्त्रित करता है। ठीक एक कछुए के समान, जो खतरे का आभास होते ही अपने छहों अंगों को अपने कठोर आवरण के भीतर सिकोड़ लेता है, एक साधक अपनी इन्द्रियों को संकुचित कर उन्हें आत्मोन्मुख कर लेता है।

प्रत्याहार का मनोविज्ञान: खिलौने और बच्चे का सिद्धांत

मनुष्य के मन की बनावट ऐसी है कि आप उससे बलपूर्वक कुछ नहीं छीन सकते। यदि आप मन से कहेंगे कि “मुझे बाहरी दुनिया के बारे में नहीं सोचना है”, तो वह और अधिक उसी के बारे में सोचेगा। इसे मनोविज्ञान में ‘आयरनिक प्रोसेस थ्योरी’ (Ironic Process Theory) कहते हैं।

तो फिर मन को विषयों से कैसे हटाया जाए? ग्रन्थों में इसका बहुत ही मनोवैज्ञानिक उत्तर दिया गया है— उन्हें अन्तर्मुख होने का कोई नया कार्यक्रम दिया जाए।

जैसे किसी रोते हुए बालक को चुप कराने के लिए उसकी माता यदि उसे डांटे, तो वह और रोएगा। लेकिन यदि माता उसे कोई नया खिलौना दे दे अथवा किसी नई बात में लगा दे, तो बालक का ध्यान परिवर्तित हो जाता है। वह अपना पिछला रोना भूलकर नए खिलौने के साथ खेलने लगता है।

ठीक वैसे ही, प्रत्याहार तथा धारणा की अवस्था में चित्तवृत्तियों को बलपूर्वक दबाया नहीं जाता, बल्कि उन्हें भीतर की ओर एक नए ‘कार्यक्रम’ में संलग्न कर दिया जाता है। जब मन भीतर के इस नए अनुभव में रस लेने लगता है, तो वह बाहर के शोर को स्वतः ही भूल जाता है। वाशिष्ठ संहिता (अध्याय ४), शाण्डिल्योपनिषत् (६७-६९), सिद्ध सिद्धान्त पद्धति और योगमार्तण्ड (११३-११९) में प्रत्याहार साधना की ऐसी ही अचूक विधियाँ दी गई हैं।

यद्यपि प्राणायाम से भी इन्द्रियाँ कुछ समय के लिए अपने विषयों से पराङ्‌मुख (विमुख) हो जाती हैं, परन्तु उसका प्रभाव अल्पकालिक (थोड़े समय के लिए) होता है। प्राण वायु के सामान्य होते ही मन पुनः बाहर भागने लगता है। इसलिए प्राणायाम के बाद ‘ज्ञानपूर्वक’ इन्द्रियों को विषयों से हटाने का प्रयत्न (प्रत्याहार) करना अत्यंत आवश्यक है।

प्रत्याहार का शरीर-विज्ञान: 18 मर्म स्थलों का रहस्य

हमारे ऋषियों ने मानव शरीर के नर्वस सिस्टम (स्नायु तंत्र) का बहुत सूक्ष्म अध्ययन किया था। आयुर्वेद और योग में शरीर के भीतर प्राणों के प्रवाह के प्रमुख जंक्शन पॉइंट्स को ‘मर्म स्थल’ कहा गया है। वाशिष्ठ संहिता के अनुसार, शरीर के अठारह (18) मर्म स्थलों पर प्राण को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर की ओर क्रमानुसार धारण करना ही सर्वश्रेष्ठ प्रत्याहार है।

अष्टादशसु यद्वायोर्मर्म स्थानेषु धारणम् ।
स्थानात् स्थानात् समाकृष्य प्रत्याहार स चोत्तमः ।।
(वा.स. ३१/६३-६४)

शरीर के ये 18 मर्म स्थल (Vital Points) इस प्रकार हैं:

  • 1. पैरों के अंगूठे (Big Toes)
  • 2. पैर (Feet)
  • 3. टखने (Ankles)
  • 4. पिण्डली (Calves)
  • 5. पिण्डली का ऊपरी भाग
  • 6. घुटने (Knees)
  • 7. जङ्घा (Thighs)
  • 8. गुदा (Anus/Root)
  • 9. मूत्रेन्द्रिय (Genitals)
  • 10. नाभि (Navel)
  • 11. हृदय (Heart)
  • 12. कण्ठकूप (Throat Pit)
  • 13. तालु (Palate)
  • 14. नासिकाग्र (Tip of Nose)
  • 15. नेत्र (Eyes)
  • 16. भृकुटि (Third Eye)
  • 17. ललाट (Forehead)
  • 18. मूर्धा / सहस्रार (Crown)

विज्ञान कहता है कि जहाँ-जहाँ हमारा ध्यान (Attention) जाता है, वहाँ-वहाँ ऊर्जा (Energy / Blood Flow) प्रवाहित होने लगती है। प्राण के इन 18 केन्द्रों पर स्थिर होने पर मन स्वतः ही स्थिर हो जाता है। यह एक प्रकार का प्राचीन ‘डीप बॉडी स्कैन’ (Deep Body Scan) या NSDR (Non-Sleep Deep Rest) तकनीक है जो पैरासिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम (Parasympathetic Nervous System) को सक्रिय कर शरीर को गहरे विश्राम में ले जाती है।

प्रत्याहार साधना की सम्पूर्ण वैज्ञानिक विधि (Step-by-Step Guide)

आइए, वाशिष्ठ संहिता और योगमार्तण्ड में वर्णित इस अत्यंत दुर्लभ प्रत्याहार विधि को सरल चरणों में समझते हैं। इसे आप नित्य प्रति अभ्यास में ला सकते हैं:

चरण 1: मस्तिष्क के ऊपरी केन्द्रों पर प्राण-धारण

  • आसन और मुद्रा: किसी भी आरामदायक ध्यान के आसन (पद्मासन, सिद्धासन या सुखासन) में रीढ़ की हड्डी को सीधा करके बैठ जाइए। आँखें कोमलता से बंद कर लें।
  • नासिकाग्र (Tip of the Nose): सबसे पहले अपने ध्यान को नासिका के अग्र भाग पर केन्द्रित कीजिए। श्वास को भीतर जाते और बाहर निकलते हुए देखिए। जब श्वास नासिका के अग्रभाग में स्थिर महसूस होने लगे, तब श्वास को दाहिने से बायें 3 से 7 बार मानसिक रूप से घुमायें और फिर बाहर निकाल दें। इसी प्रकार 3-7 चक्र करें।
  • भृकुटि और नेत्र: अब अपने ध्यान को भृकुटि (दोनों भौंहों के मध्य) में ले आइये। महसूस करें कि श्वास दोनों नथुनों से होता हुआ भृकुटि में जाकर स्थिर हो गया है और सारी प्राण शक्ति वहीं पर केन्द्रित हो गई है। पूर्ववत् श्वास को वहाँ घुमाकर धीरे से बाहर निकाल दीजिये। यही प्रक्रिया दोनों नेत्रों और तालु प्रदेश में ले जाकर दोहराएं।
  • मूर्धा (सहस्रार चक्र): श्वास और ध्यान को सिर की चोटी (सहस्रार चक्र) पर ले जाकर वहाँ रोक लें, उसे घुमाकर निकाल दें।

चरण 2: धड़ के केन्द्रों पर अवतरण (Throat to Navel)

  • कण्ठकूप (गले का गड्ढा): सहस्रार चक्र के पश्चात् ध्यान को कण्ठकूप (विशुद्ध चक्र) में लगाकर श्वास-प्रश्वास करें। आप अनुभव करेंगे कि सारे मस्तिष्क की प्राणशक्ति श्वास के साथ नीचे उतर कर कण्ठकूप में केन्द्रित हो गई है। इसका वैज्ञानिक प्रभाव यह होता है कि मस्तिष्क का सारा दबाव और तनाव दूर हो जाता है और सिर बहुत हलका महसूस होने लगता है।
  • हृदय प्रदेश (अनाहत चक्र): अब ध्यान को कण्ठकूप से उतारकर हृदय प्रदेश में ले आइये। श्वास और प्राण शक्ति गले से उतरकर हृदय में स्थिर हो गई है। कुछ समय तक श्वास को वहाँ रुकता हुआ और वापस लौटता हुआ महसूस करें।
  • नाभि (मणिपूर चक्र): अब ध्यान को नाभि में ले आइये। श्वास के साथ प्राण शक्ति हृदय से उतरकर नाभि में केन्द्रित हो गई है। श्वास को नाभि के चक्र में घुमाकर बाहर निकाल दीजिये।

चरण 3: निचले अंगों में चेतना का विस्तार

  • मूलाधार चक्र: ध्यान को नाभि से नीचे मूलाधार (गुदा और मूत्रेन्द्रिय के मध्य) में टिका दीजिये। महसूस करें कि श्वास नासिका, भृकुटि और मस्तिष्क से होता हुआ सुषुम्णा नाड़ी के मार्ग से सीधा मूलाधार तक जा रहा है। प्राणशक्ति नाभि से सरकती हुई यहाँ केन्द्रित हो गई है।
  • कूल्हों के जोड़ (Pelvic Joints): अब ध्यान को दोनों कूल्हों के जोड़ों में केन्द्रित कीजिये। श्वास का सूक्ष्म प्रवाह सुषुम्णा के मार्ग से मूलाधार तक आकर दो भागों में विभक्त हो गया है और दोनों कूल्हों में जाकर स्थिर हो गया है। प्राण शक्ति वहाँ केन्द्रित हो गई है। (शेष क्रिया पूर्ववत् श्वास को घुमाने वाली रखें)।
  • जंघा से टखनों तक: इसी प्रकार क्रमशः श्वास एवं प्राण शक्ति को दोनों जंघाओं (Thighs), घुटनों (Knees), पिण्डली (Calves) और टखनों (Ankles) में केन्द्रित करते हुए नीचे की ओर ले जाएं।

चरण 4: चरम बिंदु – अंगूठे पर मन को बाँधना (The Masterstroke)

  • दाहिने पैर का अंगूठा: यह प्रत्याहार की सबसे गहरी अवस्था है। अब ध्यान को दाहिने पैर के अंगूठे पर ले आइये। महसूस करें कि श्वास का सूक्ष्म प्रवाह और प्राणशक्ति मस्तिष्क से उतरकर सुषुम्णा मार्ग से मूलाधार, कूल्हों के जोड़, जङ्घा, घुटने, पिण्डली और टखनों में प्रवाहित होती हुई दाहिने पैर के अंगूठे पर जाकर पूर्णतः केन्द्रित हो गई है।
  • जड़वत् अवस्था: इस अवस्था में सारे शरीर की चेतना केवल उस एक अंगूठे पर आ गई है। शेष सारा शरीर ‘जड़वत्’ (Inert/सुन्न) हो गया है। दाहिने पैर के अंगूठे पर ही ध्यान को टिकाये रखिये।
  • मन का अनुचर (दास) बनना: चूँकि मन हमेशा गति चाहता है, लेकिन अब उसे शरीर में अंगूठे से आगे जाने का कोई स्थान ही नहीं मिल रहा है, इसलिए वह हार मानकर वहीं पर आपका अनुचर (दास/सेवक) बनकर ठहर जाता है। इस बिंदु पर मन में किसी प्रकार का बाहरी चिन्तन नहीं रहता।
  • निर्विकार स्थिति: श्वास यदि स्वाभाविक रूप से चलता है तो उसे चलने दीजिये। यदि वह बहुत सूक्ष्म होकर रुकता सा प्रतीत होता है, तो उधर ध्यान मत दीजिये। बस निर्विकार (बिना किसी विचार के) होकर ध्यान को केवल दाहिने पैर के अंगूठे पर टिकाये रखिये।

चरण 5: चेतना की वापसी (The Return Journey)

  • कुछ समय उस शून्यता और शांति में रहने के पश्चात्, जिस क्रम से आप ऊपर से नीचे आये थे, ठीक उसी क्रम से (अंगूठा -> टखने -> घुटने -> नाभि -> हृदय -> कण्ठ) वापस लौटें।
  • अन्त में ध्यान को पुनः भृकुटि (Mid-brow) पर लाकर छोड़ दीजिये।
  • यदि नीचे जाने पर मन एकदम शान्त और शून्य हो गया है, तो आप बीच के मार्गों को छोड़कर उसे सीधा भृकुटि पर भी ला सकते हैं।

यह क्रिया ठीक वैसी ही है, जैसे कोई माता अपने बेचैन बालक को अपनी गोद में थपकी देकर पहले सुला देती है, और जब वह गहरी नींद में सो जाता है, तो अत्यंत कोमलता से उसे बिस्तर पर लिटा देती है। मन को बाह्य विषयों के शोर-शराबे से हटाकर उसे भीतर की गहराई में केन्द्रित करने के लिए प्रत्याहार की यह ‘मर्म-स्थल विधि’ एक ब्रह्मास्त्र की तरह काम करती है。

प्रत्याहार का अंतिम फल: इन्द्रिय जय (Mastery Over Senses)

पतंजलि योग सूत्र के द्वितीय पाद (साधन पाद) के 55वें सूत्र में महर्षि पतंजलि प्रत्याहार के अंतिम फल का वर्णन करते हुए कहते हैं:

“ततः परमावश्यतेन्द्रियाणाम्” (योग सूत्र २।५५)

अर्थ: प्रत्याहार की सिद्धि हो जाने के बाद साधक की इन्द्रियाँ उसकी पूर्ण स्वाधीनता (Control) में आ जाती हैं, अर्थात् उसे ‘इन्द्रिय जय’ प्राप्त हो जाता है।

इन्द्रिय जय का अर्थ यह नहीं है कि आपकी इन्द्रियाँ सुन्न हो जाएंगी या आप देख-सुन नहीं पाएंगे। इसका वैज्ञानिक अर्थ यह है कि इन्द्रियों की दासता समाप्त हो जाएगी। आज स्थिति यह है कि फोन की एक रिंग बजती है (कानों तक ध्वनि पहुँचती है) और हम अपना जरूरी काम छोड़कर फोन उठाने दौड़ पड़ते हैं; एक स्वादिष्ट मिठाई देखते हैं (आँखों से विषय भीतर जाता है) और हम अपना डाइट प्लान तोड़ देते हैं। यह इन्द्रियों की दासता है।

परन्तु जो साधक प्रत्याहार सिद्ध कर लेता है, वह ‘जितेन्द्रिय’ हो जाता है। वह जहाँ अपने मन को ठहराना या चलाना चाहे, उसी में उसे ठहरा और चला सकता है। उसके सामने कितने ही विचलित करने वाले दृश्य हों, कितना ही शोर हो, या कितना ही तनावपूर्ण वातावरण हो; वह अपनी इच्छा से अपनी चेतना को एक कछुए की भांति समेट कर अपने भीतर की परम शांति में लौट सकता है।

निष्कर्ष

प्रत्याहार केवल एक दार्शनिक शब्द नहीं है, यह आधुनिक मानव को डिप्रेशन, ओवरथिंकिंग और मोबाइल-स्क्रीन की गुलामी से आज़ाद करने का एक नितांत प्रामाणिक न्यूरो-साइंटिफिक टूल है। शरीर के इन 18 मर्म स्थानों पर प्राण और चेतना को घुमाने का यह अभ्यास न केवल हमारे तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को ‘रीबूट’ करता है, बल्कि हमें स्वयं का सच्चा स्वामी भी बनाता है।

अपनी नित्य की योग साधना में केवल आसन और प्राणायाम पर ही न रुकें; प्रतिदिन 15 मिनट इस प्रत्याहार विधि का अभ्यास करें। जब आपका मन आपकी इन्द्रियों के कोलाहल से मुक्त होकर भीतर की ओर मुड़ेगा, तब आप उस असीम शांति का अनुभव करेंगे जो बाहर की किसी भी भौतिक वस्तु में प्राप्त नहीं हो सकती। यही योग का वास्तविक लक्ष्य है।

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख पूर्णतः शैक्षिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। प्राचीन योग ग्रन्थों (जैसे वाशिष्ठ संहिता और पतंजलि योग सूत्र) पर आधारित प्रत्याहार की यह उन्नत तकनीक मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालती है। यदि आप मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी किसी समस्या (जैसे गंभीर अवसाद या एंग्जायटी) से गुज़र रहे हैं, तो किसी भी यौगिक या ध्यान प्रक्रिया का अभ्यास किसी योग्य योग गुरु या चिकित्सक के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में ही करें।
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