ग्रीष्म ऋतु में आहार-विहार: आयुर्वेद के अनुसार समर डाइट प्लान | Ayurvedic Summer Diet
ग्रीष्म ऋतु: एक आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक परिचय
आयुर्वेद में ग्रीष्म ऋतु और शरीर पर इसके प्रभाव का अत्यंत सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है। अष्टांग हृदय सूत्र के अनुसार, इस काल को ‘आदान काल’ या ‘आग्नेय काल’ भी कहा जाता है।
- पृथ्वी की गति के मार्ग के स्वभाव के कारण, इस समय सूर्य की किरणें और वायु अत्यंत तीखी, रूखी और गर्म हो जाती हैं।
- इन तीक्ष्ण और उष्ण हवाओं के कारण पृथ्वी के सौम्य (कोमल और ठंडे) गुणों में भारी कमी आने लगती है।
- प्रकृति में सौम्य गुणों की कमी होने के परिणामस्वरूप तिक्त (कड़वा), कषाय (कसैला) और कटु (तीखा) रस क्रमशः अधिक बलवान और प्रभावी होते जाते हैं।
ग्रीष्म ऋतु का शारीरिक और प्राकृतिक प्रभाव
जब पृथ्वी भ्रमण करते हुए सूर्य के अत्यधिक निकट आ जाती है, तो सूर्य की किरणें बहुत गर्म और तीखी हो जाती हैं।
- ये तेज़ किरणें पृथ्वी का जलीयांश (नमी) और चिकनाई पूरी तरह से सोख लेती हैं।
- यह काल आदानकाल की चरम सीमा होता है।
- गर्मी और लू का यह तीव्र प्रभाव केवल वनस्पतियों, नदियों, कुओं और तालाबों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि प्राणियों के शरीर को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करता है।
हमारे शरीर को स्वस्थ, बलशाली और सुडौल बनाए रखने के लिए स्निग्धता (चिकनाई) और सौम्यता की अत्यधिक आवश्यकता होती है।
- ग्रीष्म ऋतु में प्रकृति में इन दोनों तत्वों का अभाव हो जाता है, जिसके कारण मानव शरीर भी वनस्पतियों की भांति सूखने लगता है।
- शरीर की रस, रक्त आदि सातों धातुएं क्षीण (कमजोर) होने लगती हैं।
- धातुओं के क्षीण होने के कारण शरीर में स्वाभाविक रूप से दुर्बलता आ जाती है।
पाचन तंत्र पर वैज्ञानिक प्रभाव और रोग-संक्रमण
गर्मी के मौसम में शरीर का तापमान नियंत्रित रखने के लिए पसीना अधिक आता है और प्यास भी बहुत अधिक लगती है।
- इसके कारण व्यक्ति बहुत अधिक मात्रा में जल का सेवन करता है।
- अत्यधिक जल पीने से आंतों में पाया जाने वाला प्राकृतिक अम्ल (Acid) जल में घुलकर पतला हो जाता है।
- आंतों में अम्लीयता की कमी होने से वे जीवाणुओं (बैक्टीरिया) के संक्रमण के अनुकूल बन जाती हैं।
- यही वैज्ञानिक कारण है कि इस ऋतु में उलटी और दस्त की शिकायत होने की सम्भावना काफी अधिक बढ़ जाती है।
पित्त दोष का प्रकोप
यदि इस मौसम में गलत आहार-विहार किया जाए, तो शरीर में पित्त दोष प्रकुपित (असंतुलित) हो जाता है। पित्त दोष के कुपित होने से शरीर में निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं:
- अत्यधिक प्यास लगना।
- ज्वर (बुखार) आना।
- शरीर में जलन महसूस होना।
- रक्तपित्त (नाक आदि अंगों से रक्तस्राव होना)।
- चक्कर आना और सिरदर्द रहना।
पथ्य आहार (ग्रीष्म ऋतु में क्या खाएं)
इन रोगों और दुर्बलता से बचने के लिए आयुर्वेद ने विशिष्ट पथ्य (सेवनीय) आहार का निर्देश दिया है। इस ऋतु में ऐसे पदार्थों का सेवन करना चाहिए जिनके गुण-धर्म ग्रीष्म ऋतु के विपरीत हों, ताकि ऋतु के विपरीत प्रभाव को सन्तुलित और सामान्य किया जा सके। महर्षि वाग्भट् के निर्देश ‘भजेन्मधुर मेवान्नं लघु स्निग्ध हिमं द्रवं’ के अनुसार, इस मौसम में मधुर, हल्के, स्निग्ध (चिकनाई युक्त), शीतल और तरावट वाले पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए। इससे तिक्त, कटु और कषाय रस शान्त बने रहते हैं और कुपित नहीं होते।
अनुशंसित खाद्य पदार्थों की सूची
| खाद्य श्रेणी | सेवनीय पदार्थ |
|---|---|
| सब्जियां | चौलाई, करेला, बथुआ, परवल, पके टमाटर, छिलकारहित आलू, कच्चे केले की सब्ज़ी, सहजन की फली, प्याज, पुदीना, नींबू। |
| दालें | जहां तक हो सके छिलके वाली मूंग की दाल लें। यदि तुवर (अरहर) की दाल का सेवन करें तो उसमें घी और जीरे का छौंक लगाएं क्योंकि यह दाल खुश्क होती है। |
| फल | मीठे आम, खरबूज, तरबूज, सन्तरे, अंगूर, हरी पतली ककड़ी, शहतूत, फालसा, अनार, आंवले का मुरब्बा। |
| सूखे मेवे | किशमिश, मुनक्का, पिण्डखजूर। |
| तरल पदार्थ (पेय) | मीठी नींबू की शिकंजी, केरी का पना, मीठे दही की लस्सी, बेल का शरबत, ठण्डाई, चन्दन/खसखस या गुलाब का शरबत, गन्ने/सेब या मीठे सन्तरों का रस, मीठा पतला सत्तू, मिश्री व घी मिला दूध, नारियल पानी। |
आहार और जल सेवन के विशेष नियम
- जल हमेशा शुद्ध और ठण्डा (सुराही का) पीना चाहिए।
- आवश्यकता हो तो पानी को उबाल कर, ठण्डा करके फ्रिज़ में रख कर पी सकते हैं।
- प्रातः और दोपहर के भोजन के उपरान्त नमक व जीरा युक्त ताज़ी छाछ अवश्य लेनी चाहिए।
- प्रत्येक व्यक्ति की पाचन शक्ति और शरीर की आवश्यकता अलग-अलग होती है, अतः स्वास्थ्य रक्षा सम्बन्धी ये नियम सब पर एक समान लागू नहीं हो सकते।
- अपनी पाचन शक्ति को ध्यान में रखकर उतनी ही मात्रा में आहार का सेवन करना चाहिए जितना आसानी से पच जाए।
- रात का भोजन विशेष रूप से हल्का और सुपाच्य होना चाहिए।
- सप्ताह में एक दिन मूंग की दाल और चावल की खिचड़ी व फलों का ही सेवन करना चाहिए।
अपच की पहचान: इस ऋतु में अपच की शिकायत प्रायः हो जाती है। भोजन का समय हो जाने पर भी भूख न लगना, भोजन के प्रति अरुचि होना, पेट फूलना या भारी रहना, शरीर में सुस्ती व थकावट बने रहना, सिर भारी रहना या दुखना, पतले दस्त लगना या मल का बहुत कठोर हो जाना—ये सभी लक्षण अपच होने की खबर देते हैं。
पथ्य विहार (ग्रीष्म ऋतु में उपयुक्त जीवनशैली)
आयुर्वेद स्वस्थ रहने के लिए आहार के साथ-साथ उपयुक्त विहार (दिनचर्या) को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है।
- ग्रीष्म ऋतु में सूर्योदय से पहले शौच और स्नान से निवृत्त होकर 2-3 किलोमीटर तक सैर करना बहुत ही आवश्यक होता है।
- देर रात तक न जाग कर जल्दी सोना चाहिए।
- यदि किसी अनिवार्य कारणवश देर रात तक जागना ही पड़े तो वात और पित्त के प्रकोप से बचने के लिए घण्टे-घण्टे भर से 1-1 गिलास ठण्डा पानी पीते रहना चाहिए।
- बाहर धूप में जाने से पहले एक गिलास ठण्डा पानी अवश्य पीना चाहिए तथा सिर को ढक कर ही बाहर निकलना चाहिए।
- स्नान से पहले शरीर पर जैतून के तैल (Olive oil) की मालिश करनी चाहिए।
- अष्टांग हृदय के श्लोक के अनुसार, ग्रीष्म ऋतु में विवाहित स्त्री-पुरुषों को 15 दिन में केवल एक ही बार सहवास करना चाहिए।
अपथ्य आहार (ग्रीष्म ऋतु में क्या न खाएं)
यह ऋतु चूंकि आदानकाल के अन्तिम समय में होती है और ‘आदावन्ते च दौर्बल्यं’ के सिद्धांत के अनुसार इस समय जठराग्नि (पाचन शक्ति) अत्यंत दुर्बल रहती है। अतः निम्नलिखित पदार्थों का सेवन पूर्णतः वर्जित है:
- ग्रीष्म काल में देर से पचने वाले भारी पदार्थ, तेज़ मिर्च-मसालेदार, खट्टे, खारे और तले हुए व्यंजन नहीं खाने चाहिए।
- उष्ण (गर्म) प्रकृति के और तिक्त, कटु, कषाय और अम्ल (खट्टे) रस वाले पदार्थों का सेवन न करें।
- बेसन के बने और दुर्गन्धयुक्त पदार्थों से बचना चाहिए।
- हर किसी स्थान का पानी नहीं पीना चाहिए।
- शहद और खट्टा दही का सेवन नहीं करना चाहिए (शहद को केवल औषधि के अनुपान के रूप में लिया जा सकता है)।
- अण्डा, शराब, मांस, उड़द, इमली, अमचूर और सिरका आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
जल सेवन में सावधानियां:
- फ्रिज़ में रखा पानी तत्काल निकालकर न पिएं; इसे थोड़ी देर तक फ्रिज़ से बाहर रखकर या सादा पानी मिलाकर ही पिएं।
- एक बार में अधिक मात्रा में जल नहीं पीना चाहिए, क्योंकि इससे जठराग्नि कमजोर होती है जो इस ऋतु में पहले से ही दुर्बल रहती है।
- बाहर से आते ही तत्काल पानी नहीं पीना चाहिए।
- घर आए किसी भी व्यक्ति को आते ही तत्काल पानी पेश नहीं करना चाहिए।
अपथ्य विहार (किन आदतों से बचें)
इस ऋतु में सबसे प्रमुख अपथ्य विहार देर रात तक जागना और सुबह देर तक सोये रहना है।
- आधुनिक जीवनशैली, बढ़ती विलासिता, आर्थिक और व्यावसायिक विवशता के साथ-साथ टी.वी. चैनल्स के कार्यक्रम देर रात तक जागने के प्रमुख कारण हैं।
- सूर्योदय के बाद तक सोये रहना और उसके बाद शौच व स्नान करना स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है।
- अधिक सहवास करना।
- अधिक शारीरिक परिश्रम या अधिक व्यायाम करना।
- तेज़ धूप में या अति उष्ण (गर्म) वातावरण में काम करना।
- शरीर के प्राकृतिक वेगों जैसे प्यास और मल-मूत्र के वेग को रोकना।
विशेष: बड़ी हरड़ रसायन का प्रयोग
आयुर्वेद में रसायन सेवन का विशेष महत्व है।
- जो व्यक्ति पूरे वर्ष तक बड़ी हरड़ का सेवन रसायन के रूप में नियमित रूप से करते हैं, उन्हें ग्रीष्म ऋतु के दिनों में विशेष विधि अपनानी चाहिए।
- ऐसे व्यक्तियों को बड़ी हरड़ का महीन पिसा हुआ चूर्ण और गुड़ समान मात्रा में (समभाग) मिलाना चाहिए।
- दोनों द्रव्यों के इस मिश्रण को प्रातःकाल खाली पेट एक चम्मच मात्रा (लगभग 5-6 ग्राम) में लेना चाहिए।

