सुप्रीम कोर्ट सख्त: मिलावटी खाद्य पदार्थों पर FSSAI और केंद्र को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: मिलावटी और असुरक्षित खाद्य पदार्थों पर केंद्र सरकार और FSSAI को नोटिस जारी
भारत में खाद्य सुरक्षा एक ऐसा विषय है जो सीधे तौर पर देश के 140 करोड़ से अधिक नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। दुर्भाग्यवश, बाजार में मिलावटी, नकली और असुरक्षित खाद्य पदार्थों की बढ़ती आवक ने एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को जन्म दे दिया है। इस अत्यंत संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। देश की शीर्ष अदालत ने धड़ल्ले से बिक रहे असुरक्षित खाद्य पदार्थों के मामले में केंद्र सरकार (Central Government) और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) को नोटिस जारी कर उनसे विस्तृत जवाब तलब किया है।
यह महत्वपूर्ण और दूरगामी आदेश सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ द्वारा पारित किया गया, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) और जस्टिस संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta) शामिल थे। पीठ ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि देश में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए कानून और नियामक संस्थाएं जमीनी स्तर पर अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल साबित हो रही हैं। कोर्ट का यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब नागरिकों की सेहत के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को और अधिक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
जनहित याचिका (PIL) की पृष्ठभूमि और मुख्य मांगें
सुप्रीम कोर्ट का यह नोटिस एक विस्तृत और तथ्यपरक जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) की सुनवाई के दौरान जारी किया गया। यह याचिका प्रसिद्ध आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. अनिरुद्ध मालपानी (Dr. Aniruddha Malpani) द्वारा दायर की गई है। याचिका में अत्यंत मुखरता से यह मुद्दा उठाया गया है कि ‘खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006’ (Food Safety and Standards Act, 2006) का कागजी और सैद्धांतिक ढांचा भले ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के बिल्कुल अनुरूप और बहुत मजबूत प्रतीत होता हो, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर इसका प्रभावी क्रियान्वयन (Implementation) बेहद कमजोर, निराशाजनक और खामियों से भरा हुआ है।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह तर्क प्रस्तुत किया कि नागरिकों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन प्राप्त करने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत दिए गए ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ (Right to Life and Personal Liberty) का एक अभिन्न अंग है। जब राज्य अपने नागरिकों को मिलावटी और जहरीले भोजन से बचाने में विफल रहता है, तो यह सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।
“कानून किताबों में बहुत सख्त हो सकते हैं, लेकिन यदि उन्हें लागू करने वाली एजेंसियां उदासीन हों या उनके पास पर्याप्त संसाधन न हों, तो वे कानून आम जनता के लिए अर्थहीन हो जाते हैं। खाद्य सुरक्षा के मामले में भारत आज इसी विडंबना का सामना कर रहा है।”
FSSAI की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर और चिंताजनक सवाल
याचिका में देश की शीर्ष खाद्य नियामक संस्था, FSSAI की कार्यप्रणाली और उसकी संरचनात्मक कमियों को प्रमुखता से उजागर किया गया है। कोर्ट के समक्ष ऐसे कई तथ्य रखे गए जो यह साबित करते हैं कि यह नियामक संस्था अपने मूल दायित्वों का निर्वहन करने में पिछड़ रही है। याचिका में उठाए गए प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे की भारी कमी
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में खाद्य सुरक्षा की निगरानी करना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि पूरे देश में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों (Food Safety Officers – FSOs) की संख्या आवश्यकता के अनुपात में अत्यंत कम है। लाखों खाद्य व्यवसायों, रेस्तरां, ठेले वालों और विनिर्माण इकाइयों की निगरानी के लिए मुट्ठी भर अधिकारी मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, देश में मान्यता प्राप्त और अत्याधुनिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं (Food Testing Labs) की भी भारी कमी है। जो प्रयोगशालाएं मौजूद हैं, वे भी आधुनिक उपकरणों और प्रशिक्षित कर्मचारियों के अभाव से जूझ रही हैं, जिसके कारण सैंपलों की जांच रिपोर्ट आने में महीनों लग जाते हैं।
2. CAG की रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे
याचिकाकर्ता ने अदालत का ध्यान भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा वर्ष 2017 में प्रस्तुत की गई एक विस्तृत ऑडिट रिपोर्ट की ओर भी आकर्षित किया। यह रिपोर्ट FSSAI की कार्यप्रणाली की पोल खोलती है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि नियमों के उल्लंघन और मिलावट के मामलों में लगाए गए लगभग 47 प्रतिशत जुर्माने की कभी वसूली ही नहीं हो सकी। इसका सीधा अर्थ यह है कि मिलावटखोरों के मन में कानून का कोई भय नहीं है। इसके अलावा, ढेरों मामलों में निर्धारित समयसीमा के भीतर कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई भी पूरी नहीं की गई, जिससे अपराधी आसानी से बच निकलते हैं।
3. संगठित और असंगठित क्षेत्र में फैला मिलावट का मकड़जाल
आमतौर पर यह माना जाता है कि मिलावट केवल सड़क किनारे बिकने वाले खुले सामान या असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) तक ही सीमित है। लेकिन याचिका में इस मिथक को तोड़ते हुए बताया गया है कि खाद्य सुरक्षा नियमों का खुला उल्लंघन बड़े और संगठित क्षेत्रों (Organized Sectors) में भी हो रहा है। बड़े ब्रांड्स के पैकेटबंद खाद्य पदार्थों (Packaged Foods) में हानिकारक रसायनों, अतिरिक्त चीनी (Added Sugar), और कृत्रिम रंगों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। इसके साथ ही दूषित डेयरी उत्पाद (सिंथेटिक दूध, नकली पनीर), मसालों में कैंसरकारी तत्वों की मौजूदगी और यहां तक कि बच्चों को दिए जाने वाले मिड-डे मील (Mid-Day Meal) में गुणवत्ता के अभाव जैसे कई गंभीर उदाहरणों का जिक्र किया गया है।
स्वास्थ्य पर मिलावटी खाद्य पदार्थों का विनाशकारी प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप इसलिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि मिलावटी भोजन देश में एक ‘साइलेंट किलर’ (Silent Killer) की तरह काम कर रहा है। भोजन में मिलाए जाने वाले हानिकारक रसायन और भारी धातुएं (Heavy Metals) मानव शरीर में धीरे-धीरे जमा होते रहते हैं और समय के साथ गंभीर और असाध्य बीमारियों का कारण बनते हैं।
- पाचन तंत्र और लीवर की बीमारियां: मिलावटी मसालों, अखाद्य रंगों (Non-permitted food colors) और घटिया तेल के लगातार सेवन से गट हेल्थ (Gut Health) पूरी तरह बर्बाद हो जाती है। इससे फैटी लीवर, अल्सर और आंतों की गंभीर सूजन (IBS) जैसी समस्याएं आम हो गई हैं।
- कैंसर का बढ़ता खतरा: फलों और सब्जियों को समय से पहले पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड (Calcium Carbide) का उपयोग, और दूध में यूरिया व डिटर्जेंट की मिलावट शरीर में कार्सिनोजेनिक (कैंसर पैदा करने वाले) तत्वों को प्रवेश कराती है।
- हार्मोनल असंतुलन: खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले प्रिजर्वेटिव्स और कीटनाशकों के अवशेष बच्चों और युवाओं में हार्मोनल असंतुलन पैदा कर रहे हैं, जिससे मोटापा, मधुमेह (Diabetes), और थायराइड (Thyroid) जैसी बीमारियां कम उम्र में ही हो रही हैं।
- कुपोषण (Malnutrition): जब भोजन अपने मूल पोषक तत्वों से ही वंचित हो जाता है, तो उसे खाने से पेट तो भरता है, लेकिन शरीर को पोषण नहीं मिलता। यह देश में “छिपी हुई भूख” (Hidden Hunger) को बढ़ावा दे रहा है।
खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2006: कमजोर कड़ी कहां है?
विधिक दृष्टिकोण से देखें तो ‘खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006’ में मिलावटखोरों के खिलाफ आजीवन कारावास और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन विडंबना यह है कि इन कड़े प्रावधानों का उपयोग अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही किया जाता है। अधिकांश मामलों में खाद्य सुरक्षा अधिकारी केवल मामूली जुर्माना लगाकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। अभियोजन (Prosecution) की दर अत्यंत दयनीय है। इसके अलावा, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की भारी कमी है। कानून तो केंद्र ने बना दिया है, लेकिन इसे लागू करने की मुख्य जिम्मेदारी राज्य सरकारों के खाद्य सुरक्षा विभागों की होती है, जो अक्सर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और भ्रष्टाचार के कारण निष्क्रिय रहते हैं।
आगे की राह: सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के क्या मायने हैं?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन काम करने वाले FSSAI को नोटिस जारी किए जाने के बाद, अब इन सरकारी एजेंसियों को कोर्ट के सामने अपनी विस्तृत कार्ययोजना (Action Plan) और स्पष्टीकरण पेश करना होगा। उन्हें यह बताना होगा कि CAG की रिपोर्ट आने के इतने वर्षों बाद भी सुधार के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
कानूनी विशेषज्ञों और जनस्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह दखल देश के खाद्य सुरक्षा परिदृश्य में एक ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकता है। न्यायालय भविष्य में निम्नलिखित कड़े दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी कर सकता है:
- देश भर में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरने का आदेश।
- हर जिले में कम से कम एक अत्याधुनिक और NABL मान्यता प्राप्त खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना।
- मिलावट के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट (Fast-track courts) का गठन।
- जुर्माने की वसूली और दंडात्मक कार्रवाइयों की नियमित मॉनिटरिंग के लिए एक स्वतंत्र समिति का निर्माण।
- उपभोक्ताओं के लिए एक पारदर्शी और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism) की स्थापना।
निष्कर्ष
भोजन जीवन का मूल आधार है। यदि जीवन का आधार ही विषैला हो जाए, तो एक स्वस्थ, सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की कल्पना कैसे की जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट का यह कड़ा रुख उन करोड़ों नागरिकों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो हर दिन बाजार से अपने परिवार के लिए जहर खरीदने को मजबूर हैं। यह मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि घोर नैतिक और मानवीय भी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार और FSSAI सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष क्या बचाव प्रस्तुत करते हैं और देश में ‘सुरक्षित भोजन के अधिकार’ को सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका क्या ऐतिहासिक कदम उठाती है। नागरिकों के स्वास्थ्य की कीमत पर किसी भी प्रकार के मुनाफे और लापरवाही को अब कानूनी ढाल नहीं मिलनी चाहिए।
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