Editor's Pick

प्रसन्नात्मा इन्द्रिय मनः सुश्रुत संहिता में स्वास्थ्य | Ayushya Path

आयुर्वेद की अमर परिभाषा: प्रसन्नात्मा इन्द्रिय मनः | आयुष्य पथ
सम्पादकीय विशेष

आयुर्वेद की अमर परिभाषा: स्वास्थ्य केवल मेडिकल रिपोर्ट नहीं, ‘प्रसन्न आत्मा, इन्द्रिय और मन’ का संयोग है

आधुनिक युग में जब हम ‘स्वास्थ्य’ (Health) की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान तुरंत मेडिकल रिपोर्ट्स की तरफ जाता है। ब्लड प्रेशर, शुगर लेवल, कोलेस्ट्रॉल और BMI को ही स्वास्थ्य का अंतिम पैमाना मान लिया गया है। लेकिन, क्या शरीर में बीमारी का न होना ही असली स्वास्थ्य है? यदि शरीर की सारी रिपोर्ट्स सामान्य हैं, लेकिन मन में तनाव है, रात को नींद नहीं आती और भीतर एक खालीपन है, तो क्या आप वास्तव में स्वस्थ हैं?

हजारों वर्ष पूर्व, शल्य चिकित्सा (Surgery) के जनक महर्षि सुश्रुत ने स्वास्थ्य की एक ऐसी गहन, समग्र और शाश्वत परिभाषा दी है, जहाँ तक आधुनिक विज्ञान आज पहुँचने का प्रयास कर रहा है।

सम दोष सम अग्निश्च सम धातु मल क्रियाः।
प्रसन्नात्मा इन्द्रिय मनः स्वस्थ इतिभिधीयते॥
(सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान 15/41)

1. श्लोक का शारीरिक आयाम (Physical Health)

इस श्लोक का पहला भाग मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य के विज्ञान को स्पष्ट करता है:

  • सम दोष: शरीर को चलाने वाले तीन मुख्य तत्व— वात, पित्त और कफ— अपनी प्राकृत अवस्था में हों।
  • सम अग्नि: पाचन अग्नि (जठराग्नि) सुचारू रूप से कार्य कर रही हो, जिससे शरीर में ‘आम’ (Toxins) न बने।
  • सम धातु: शरीर का निर्माण करने वाली सातों धातुएं (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) पूर्ण रूप से पोषित हों।
  • सम मल क्रिया: मल, मूत्र और स्वेद (पसीना) का निष्कासन नियमित हो।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान मुख्य रूप से इन्हीं चार मापदंडों पर काम करता है। लेकिन महर्षि सुश्रुत का विज्ञान यहीं नहीं रुकता।

2. मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक आयाम (Mind, Senses & Soul)

श्लोक का दूसरा भाग आयुर्वेद को दुनिया की अन्य सभी चिकित्सा पद्धतियों से श्रेष्ठ बनाता है: “प्रसन्नात्मा इन्द्रिय मनः”। यदि शरीर स्वस्थ है लेकिन आत्मा, इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न नहीं हैं, तो व्यक्ति पूर्ण रूप से ‘स्वस्थ’ नहीं है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इन्हें ‘प्रसन्न’ कैसे किया जाए? इसका उत्तर हमें आयुर्वेद के साथ-साथ महर्षि पतंजलि के योग सूत्र और श्रीमद्भगवद्गीता के मनोविज्ञान से मिलता है।

A. प्रसन्न मन: पतंजलि का ‘चित्त प्रसादन’ सूत्र

मन को प्रसन्न और शांत कैसे रखें? इसके लिए महर्षि पतंजलि ने ‘योग दर्शन’ में व्यावहारिक मनोविज्ञान का एक अद्भुत अस्त्र दिया है:

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥
(पातंजल योग सूत्र, समाधि पाद 1.33)

अर्थात, मन (चित्त) को प्रसन्न (प्रसादन) रखने के लिए चार भावनाएं विकसित करें:

  • मैत्री: सुखी लोगों को देखकर ईर्ष्या न करें, उनसे मित्रता का भाव रखें।
  • करुणा: दुखी लोगों को देखकर उनके प्रति करुणा (दया) रखें।
  • मुदिता: पुण्य कर्म करने वाले सज्जन लोगों को देखकर प्रसन्न हों।
  • उपेक्षा: पापी या दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों से उलझें नहीं, उनके प्रति उदासीनता (उपेक्षा) का भाव रखें।

B. प्रसन्न इन्द्रियां: भगवद्गीता का ‘इन्द्रिय निग्रह’

क्या इन्द्रियों को उनके मनचाहे विषय (गैजेट्स, जंक फूड) देने से वे प्रसन्न होती हैं? नहीं, अति-भोग से इन्द्रियां थक जाती हैं और बीमार पड़ती हैं। भगवद्गीता इन्द्रियों की प्रसन्नता का वास्तविक विज्ञान बताती है:

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 2.64)

अर्थात, जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को राग (Addiction) और द्वेष (घृणा) से मुक्त रखकर, उन्हें अपने वश में रखते हुए विषयों का उपभोग करता है, वही ‘प्रसाद’ (प्रसन्नता और शांति) को प्राप्त करता है।

C. प्रसन्न आत्मा: भगवद्गीता की चरम अवस्था

जब मन पतंजलि के सूत्रों से शांत हो जाता है और इन्द्रियां गीता के ज्ञान से संयमित हो जाती हैं, तब आत्मा स्वतः प्रसन्न हो जाती है। इसे भगवद्गीता (18.54) में ‘ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा’ कहा गया है, जहाँ व्यक्ति न तो बीती बातों का शोक (Depression) करता है और न ही भविष्य की व्यर्थ लालसा (Anxiety) रखता है।

3. आधुनिक संदर्भ में इस परिभाषा की प्रासंगिकता

आज के समय में जब मानसिक स्वास्थ्य का संकट चरम पर है, तब केवल दवाइयां काम नहीं कर सकतीं। आयुष मंत्रालय भी अब “एविडेंस-बेस्ड आयुष इंटरवेंशंस इन माइंड-बॉडी हेल्थ” पर विशेष जोर दे रहा है। सुश्रुत, पतंजलि और श्रीकृष्ण का यह सम्मिलित ज्ञान हमें सिखाता है कि पूर्ण स्वास्थ्य के लिए जिम जाना और सही डाइट लेना ही काफी नहीं है, बल्कि चित्त को ईर्ष्या-द्वेष से मुक्त रखना भी उतना ही आवश्यक है।

निष्कर्ष महर्षि सुश्रुत की यह अमर परिभाषा सिद्ध करती है कि स्वास्थ्य केवल एक ‘मेडिकल स्टेट’ नहीं, बल्कि शरीर, मन, इन्द्रिय और आत्मा के ‘पूर्ण आनंद की अवस्था’ है। आयुष्य पथ न्यूज़ पोर्टल का उद्देश्य इसी समग्र (Holistic) ज्ञान को घर-घर तक पहुँचाना है, ताकि हम केवल जीवित न रहें, बल्कि एक ‘प्रसन्न’ जीवन जिएं।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख केवल शैक्षिक एवं जागरूकता उद्देश्य से है। इसमें वर्णित कोई भी सुझाव चिकित्सकीय या मनोवैज्ञानिक सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी अभ्यास या जीवनशैली परिवर्तन से पहले योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें। आयुष्य पथ किसी भी संभावित दुष्परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं है।

आपको यह भी सुनना चाहिए

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *