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WHO सम्मेलन: क्या आयुर्वेद अब ‘वैकल्पिक’ से ‘मुख्यधारा’ की ओर बढ़ रहा है?

— संपादकीय (Editorial Desk)

पश्चिम जब योग को अपनाता है, तो वह ‘वेलनेस’ (Wellness) बन जाता है, और जब हम सदियों से हल्दी का उपयोग करते हैं, तो उसे केवल ‘घरेलू नुस्खा’ माना जाता था। लेकिन अब हवा का रुख बदल रहा है। गुजरात के गांधीनगर में आयोजित विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का ‘वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन’ (Global Traditional Medicine Summit) केवल एक इवेंट नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक ‘स्वीकृति’

यह स्वीकृति इस बात की है कि आधुनिक विज्ञान के पास हर सवाल का जवाब नहीं है। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (Antibiotic Resistance) और लाइफस्टाइल बीमारियों के इस दौर में पूरी दुनिया उम्मीद भरी नज़रों से भारत और उसकी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों की ओर देख रही है।

डेटा और भरोसे की जंग

लेकिन सवाल यह है—क्या हम इस वैश्विक मंच के लिए पूरी तरह तैयार हैं? अब तक आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा ‘श्रद्धा’ और ‘अनुभव’ के आधार पर चल रही थी। लेकिन वैश्विक पटल पर टिके रहने के लिए हमें ‘डेटा’ और ‘प्रमाण’ (Evidence) की भाषा बोलनी होगी। WHO का यह कदम सराहनीय है, लेकिन यह तभी सार्थक होगा जब हम अपनी पैथी को ‘जादू’ की तरह नहीं, बल्कि एक ठोस ‘विज्ञान’ की तरह पेश करेंगे। यदि हम वैज्ञानिक मापदंडों पर खरे नहीं उतरे, तो यह अवसर हमारे हाथ से फिसल सकता है।

भारत की भूमिका: विश्व गुरु या मूक दर्शक?

भारत के पास इस समय ‘G20’ की अध्यक्षता और ‘WHO ग्लोबल सेंटर’ की मेजबानी, दोनों हैं। यह समय केवल ‘विश्व गुरु’ कहलाने का नहीं, बल्कि ‘इंटीग्रेटिव हेल्थ’ (Integrative Health) का एक ऐसा मॉडल पेश करने का है, जहाँ एलोपैथी की आपातकालीन दक्षता और आयुर्वेद की निवारक शक्ति (Preventive Power) साथ मिलकर काम करें।

निष्कर्ष

यह सम्मेलन केवल कूटनीतिक जीत नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह उस आम रोगी की जीत होनी चाहिए जो वर्षों से एक सुरक्षित और साइड-इफेक्ट्स मुक्त इलाज की राह देख रहा है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि बाज़ारवाद के चक्कर में आयुर्वेद अपनी ‘आत्मा’ न खो दे। यह समय ‘भावुक’ होने का नहीं, बल्कि अत्यंत ‘व्यावहारिक’ होने का है।

— जयप्रकाश (संपादक, आयुष्य पथ)

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