पंचकोल आयुर्वेद: चव्य, गजपिप्पली और चित्रक के औषधीय गुण | आयुष्य पथ

पंचकोल के प्रमुख घटक: चव्य, गजपिप्पली और चित्रक के अद्भुत औषधीय गुण
प्रस्तावना: जठराग्नि ही जीवन है
आयुर्वेद का एक मूलभूत सिद्धांत है— “रोगाः सर्वे अपि मन्देग्नौ” अर्थात् शरीर के सभी रोगों की उत्पत्ति जठराग्नि (पाचन तंत्र) के मंद होने से होती है। जब तक हमारा पाचन सही है, त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) संतुलित रहते हैं। इसी जठराग्नि को प्रदीप्त करने, आमदोष (Toxins) को पचाने और कफ-वात रोगों को जड़ से समाप्त करने के लिए आयुर्वेद में ‘पंचकोल’ (Panchakol) का विधान है。
पंचकोल पांच प्रमुख उग्र और तीक्ष्ण औषधियों का समूह है। हमने अपने पिछले लेख में इसके प्रारंभिक घटकों (पीपल और पिपरामूल) पर विस्तार से चर्चा की थी। आज हम भावप्रकाश निघण्टु के आधार पर पंचकोल के अन्य अत्यंत प्रभावशाली घटकों— चव्य और चित्रक के साथ-साथ गजपिप्पली के वानस्पतिक स्वरूप, शास्त्रीय कर्म और अद्भुत औषधीय लाभों का गहराई से विश्लेषण करेंगे。
1. चव्य (Chavya): बवासीर और पाचन रोगों की अचूक औषधि
शास्त्रीय श्लोक:
भवेच्चव्यं तु चविका कथता सा तथोषणा।
कणामूलगुणं चव्यं विशेषाद् गुदजापहम् ॥६७॥
परिचय और नाम: चव्य शब्द ‘चर्व्यते’ से बना है, जिसका अर्थ है— जिसे चबाकर खाया जाता है।
• संस्कृत नाम: चव्य, चविका, ऊषण।
• वानस्पतिक नाम: Piper retrofractum Vahl (पाइपर रिटोफ्रैक्टम्)। यह ‘पाइपरेसी’ (Piperaceae) कुल की वनस्पति है。
स्वरूप एवं प्राप्ति स्थान: चव्य एक अत्यंत दृढ़ लता (Climber) होती है, जो पेड़ों की डालियों से लिपटकर बढ़ती है। औषधि के रूप में इसके ‘काण्ड’ (तने/Stem) का उपयोग किया जाता है। भारत में यह मुख्य रूप से सिंगापुर, जावा और सुमात्रा के रास्ते आयात की जाती है。
आयुर्वेदिक कर्म और औषधीय लाभ: चव्य के अधिकांश गुण ‘पिपरामूल’ के समान ही होते हैं, लेकिन महर्षि भावमिश्र ने इसकी एक विशिष्ट उपयोगिता बताई है:
- बवासीर (अर्श) का नाशक: श्लोक के अनुसार यह विशेष रूप से ‘गुदजापहम्’ है। चव्य वात का अनुलोमन करता है (गैस को नीचे की ओर निकालता है) और मल को बांधने वाले अवरोध को तोड़ता है। इसलिए खूनी या बादी दोनों प्रकार की बवासीर में यह जठराग्नि बढ़ाकर मल निष्कासन को सुगम बनाता है।
- दीपन और पाचन: यह लिवर को उत्तेजित करता है और पाचक रसों का स्राव बढ़ाता है, जिससे शूल (पेट दर्द) और आध्मान (गैस/अफारा) तुरंत दूर होते हैं।
- प्रमुख आयुर्वेदिक योग: चव्यादि चूर्ण, पंचकोल चूर्ण, और प्राणदा गुटिका।
- मात्रा: चव्य (तने) का चूर्ण: 1 से 2 ग्राम।
2. गजपिप्पली (Gajapippali): श्वास और कफ रोगों की परम शत्रु
शास्त्रीय श्लोक:
चविकायाः फलं प्राज्ञैः कथिता गजपिप्पली। कपिवल्ली कोलवल्ली श्रेयसीवशिरश्च सा ॥६८॥
गजकृष्णा कटुर्वातश्लेष्महृद्वह्निवर्धिनी। उष्णा निहन्त्यतीसारं श्वासकण्ठामयक्रिमीन् ॥६९॥
(नोट: प्राचीन काल में विद्वान ‘चव्य’ के फल को ही गजपिप्पली मानते थे, लेकिन आधुनिक वनस्पति विज्ञान के अनुसार चव्य और गजपिप्पली दोनों अलग-अलग वनस्पतियां हैं।)
परिचय और नाम: सामान्य पिप्पली (पीपर) से आकार में बहुत बड़ी होने के कारण इसे ‘गजपिप्पली’ (हाथी जैसी बड़ी पीपर) कहा जाता है。
• संस्कृत नाम: कपिवल्ली, कोलवल्ली, श्रेयसी, वशिर。
• वानस्पतिक नाम: Scindapsus officinalis Schott (सिन्डेप्सस् ऑफिसिनेलिस्)। यह ‘अॅरासी’ (Araceae) कुल की वनस्पति है。
स्वरूप एवं मिलावट से सावधानी: यह भी एक लता है जो हिमालय के तराई क्षेत्रों और बंगाल के शाल वनों में पाई जाती है। इसके फल गूदेदार और 15 सेमी तक लंबे होते हैं। बाजार में गजपिप्पली के नाम से इसके सूखे हुए गोल टुकड़े मिलते हैं। ध्यान दें: कुछ बाजारों में ताड़ वृक्ष के बालों को काटकर असली गजपिप्पली के नाम से बेचा जाता है, जो कि पूर्णतः मिलावट है।
औषधीय लाभ और प्रयोग:
- कफ-निस्सारक (Expectorant): यह कटु (तीखी), उष्ण (गर्म) और वात-कफ नाशक है। श्वास (Asthma) और खांसी में जब कफ छाती में बहुत अधिक जकड़ गया हो, तो इसका फांट (Infusion) देने से कफ ढीला होकर बाहर निकल जाता है।
- बाह्य प्रयोग (Lepa): संताल जनजाति और आयुर्वेद के वैद्य इसका उपयोग आमवात (Rheumatoid Arthritis) और जोड़ों के दर्द में लेप के रूप में करते हैं, जिससे सूजन और दर्द में तुरंत राहत मिलती है।
- मात्रा: इसका फांट (1 भाग औषधि, 10 भाग पानी) 10 से 20 मिलीलीटर।
3. चित्रक (Chitrak): जठराग्नि को प्रचंड करने वाली औषधि
शास्त्रीय श्लोक:
चित्रकोऽनलनामा च पाठी व्यालस्तथोषणः। चित्रकः कटुकः पाके वह्निकृत्पाचनो लघुः ॥७०॥
रूक्षोष्णो ग्रहणीकुष्ठशोथार्शः कृमिकासनुत्। वातश्लेष्महरो ग्राही वातघ्नः श्लेष्मपित्तहृत् ॥७१॥
परिचय और औषधीय गुण: चित्रक के गुण इसके संस्कृत नामों में ही स्पष्ट रूप से छिपे हैं। इसे ‘अनलनामा’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि ‘अग्नि’ (आग) के जितने भी पर्यायवाची शब्द हैं (जैसे- पावक, दहन, कृशानु), वे सब चित्रक के नाम हैं। यह पेट की आग (जठराग्नि) को प्रज्वलित करने वाली सबसे श्रेष्ठ और उग्र औषधि है。
• संस्कृत नाम: चित्रक, पाठी, व्याल, ऊषण और अग्नि के सभी नाम。
• वानस्पतिक नाम: Plumbago zeylanica (सफेद चित्रक)।
औषधीय लाभ और रोग निवारण:
- स्वभाव: यह पचने में हल्की (लघु), रुक्ष (सूखी) और अत्यंत उष्ण वीर्य (गर्म तासीर) वाली होती है।
- रोगों पर प्रभाव: यह ग्रहणी (IBS/संग्रहणी), कुष्ठ (गंभीर चर्म रोग), शोथ (शरीर की सूजन), अर्श (बवासीर), कृमि (कीड़े) और कास (खांसी) का जड़ से नाश करती है।
- मेटाबॉलिज्म बूस्टर: यह ‘ग्राही’ (मल को बांधने वाली) औषधि है और शरीर के धीमे पड़ चुके मेटाबॉलिज्म (चयापचय) को तेज करके मोटापे और आमवात को दूर करती है।
- प्रमुख आयुर्वेदिक योग: चित्रकादि वटी (पाचन के लिए सबसे प्रसिद्ध), चित्रक हरीतकी (श्वास रोगों के लिए)।
आयुर्वेद में चित्रक की जड़ की छाल (Root Bark) का उपयोग किया जाता है। लेकिन चित्रक स्वभाव से अत्यधिक तीक्ष्ण और छाले (Blisters) पैदा करने वाला होता है। इसलिए, अशुद्ध चित्रक का सेवन वर्जित है। उपयोग से पहले चित्रक की जड़ को चूने के पानी (Lime water) में भिगोकर या गोमूत्र में भावना देकर उसका ‘शोधन’ (Purification) करना अत्यंत आवश्यक है।
निष्कर्ष
चव्य, गजपिप्पली और चित्रक—ये तीनों ही जठराग्नि के रक्षक और वात-कफ रोगों के नाशक हैं। जब इन औषधियों का युक्तिपूर्वक उपयोग किया जाता है, तो शरीर के भीतर संचित पुराने से पुराना रोग (आमदोष) जलकर भस्म हो जाता है。
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