समानता की जंग: योग और प्राकृतिक चिकित्सा को मिले ‘NCISM’ का कवच, INYGMA ने केरल में उठाई जोरदार मांग
INYGMA Kerala Demands Inclusion of Yoga & Naturopathy in NCISM Act
कोच्चि/नई दिल्ली: आयुर्वेद, यूनानी और सिद्धा चिकित्सा पद्धतियों को केंद्रीय आयोग (NCISM) का संरक्षण प्राप्त है, लेकिन योग और प्राकृतिक चिकित्सा (Yoga & Naturopathy) को अभी भी नियामक ढांचे से बाहर रखा गया है। इसी “भेदभाव” के खिलाफ अब आयुष डॉक्टरों ने मोर्चा खोल दिया है।
हाल ही में इंडियन नेचुरोपैथी एंड योग ग्रेजुएट्स मेडिकल एसोसिएशन’ (INYGMA) के केरल चैप्टर ने कोच्चि के प्रधान डाकघर (Main Post Office) के सामने प्रदर्शन कर केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर खींचा।
क्या है मुख्य मांग? प्रदर्शनकारी डॉक्टरों की मुख्य मांग है—“NCISM एक्ट में संशोधन।” INYGMA का कहना है कि योग और प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली के लिए एक ‘वैधानिक केंद्रीय विनियमन’ (Statutory Central Regulation)** होना अनिवार्य है। वे चाहते हैं कि सरकार NCISM (National Commission for Indian Systems of Medicine) एक्ट में संशोधन करे और योग-नेचुरोपैथी को भी इसमें शामिल करे।
क्यों हो रहा है विरोध? एसोसिएशन के अनुसार, देश के विभिन्न राज्यों में योग और प्राकृतिक चिकित्सा चिकित्सकों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। केंद्रीय नियामक ढांचे (Central Regulatory Framework) की कमी के कारण:
1. असमानता (Disparity): उन्हें अन्य आयुष डॉक्टरों के समान अवसर नहीं मिल रहे।
2. रोजगार में कमी: केंद्रीय स्तर पर मान्यता न होने से सरकारी नौकरियों में बाधा आती है।
3. कठिनाई: प्रैक्टिस और रजिस्ट्रेशन में राज्यों के बीच एकरूपता नहीं है।
सरकार से अपील: डॉक्टरों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा और आयुष मंत्री प्रतापराव जाधव से अपील की है कि वे इस “असंतोष” (Brewing discontent) को दूर करें और आयुष क्षेत्र में सभी पैथियों को समान दर्जा दें।
‘आयुष्य पथ’ का विश्लेषण: BNYS ग्रेजुएट्स की यह मांग जायज है। जब सरकार ‘समग्र स्वास्थ्य’ (Holistic Health) और ‘One Nation, One Health System’ की बात करती है, तो योग और नेचुरोपैथी जैसे महत्वपूर्ण अंगों को केंद्रीय कानून से बाहर रखना एक बड़ी विसंगति है।
(स्रोत: INYGMA आधिकारिक बयान/सोशल मीडिया)

