विश्व पार्किंसंस दिवस: योग और आयुर्वेद से समग्र प्रबंधन | आयुष्य पथ
सम्पादकीय विशेष: विश्व पार्किंसंस रोग दिवस (11 अप्रैल) — ‘कम्पवात’ का समग्र प्रबंधन: योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा की वैज्ञानिक एवं सहायक भूमिका
✍️ आयुष्य पथ न्यूज़ डेस्क | विशेष स्वास्थ्य आलेख
प्रस्तावना: एक वैश्विक चुनौती और समग्र समाधान की ओर बढ़ते कदम
हर वर्ष 11 अप्रैल को सम्पूर्ण विश्व में ‘विश्व पार्किंसंस रोग दिवस’ (World Parkinson’s Day) के रूप में मनाया जाता है। यह दिन डॉ. जेम्स पार्किंसन के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जिन्होंने वर्ष 1817 में पहली बार “एन एस्से ऑन द शेकिंग पाल्सी” (An Essay on the Shaking Palsy) नामक अपने शोध पत्र में इस बीमारी के लक्षणों का विस्तृत और सटीक वर्णन किया था। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य इस जटिल न्यूरोलॉजिकल विकार (Neurological Disorder) के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना, समय पर इसकी पहचान सुनिश्चित करना और इसके समग्र (Holistic) प्रबंधन की दिशा में वैश्विक प्रयासों को बल देना है। इस अभियान का सार्वभौमिक प्रतीक ‘लाल ट्यूलिप’ (Red Tulip) का फूल है, जो आशा और जीवन शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है。
आज के इस तीव्र गति वाले आधुनिक संदर्भ में, जहाँ जीवनशैली में भारी बदलाव, अत्यधिक मानसिक तनाव, पर्यावरणीय विषाक्तता (Environmental Toxins) और तेजी से बढ़ती आयु-सीमा के कारण न्यूरोडीजेनेरेटिव (Neurodegenerative – तंत्रिकाओं का क्षय करने वाले) रोग महामारी की तरह बढ़ रहे हैं; वहाँ केवल पारंपरिक औषधीय चिकित्सा पर्याप्त सिद्ध नहीं हो रही है। इस परिदृश्य में योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा जैसी हमारी प्राचीन विधाएं एक अत्यंत सशक्त ‘सहायक और एकीकृत मॉडल’ (Supportive & Integrative Model) के रूप में उभर कर सामने आ रही हैं। ये पद्धतियां रोगी के जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life) को सुधारने में एक मील का पत्थर साबित हो रही हैं。
🧬 पार्किंसंस रोग क्या है? (Scientific Understanding and Pathophysiology)
पार्किंसंस रोग (Parkinson’s Disease – PD) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) का एक जटिल, दीर्घकालिक और प्रगतिशील (Progressive) विकार है। प्रगतिशील होने का अर्थ यह है कि समय के साथ इसके लक्षण धीरे-धीरे और गंभीर होते जाते हैं。
मस्तिष्क के भीतर क्या होता है? (The Neurological Process)
मानव मस्तिष्क के मध्य भाग में एक विशेष क्षेत्र होता है जिसे ‘सब्सटेंशिया निग्रा’ (Substantia Nigra) कहा जाता है। इस क्षेत्र की तंत्रिका कोशिकाएं (Neurons) एक अत्यंत महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटर (रसायन) का उत्पादन करती हैं, जिसे ‘डोपामिन’ (Dopamine) कहा जाता है। डोपामिन हमारे शरीर की मांसपेशियों की गति, समन्वय (Coordination), संतुलन और हमारे ‘रिवॉर्ड सेंटर’ (खुशी और संतुष्टि का अहसास) को नियंत्रित करने के लिए एक ‘मैसेंजर’ के रूप में कार्य करता है。
पार्किंसंस रोग में, अज्ञात कारणों (Genetics, Environmental factors, or Protein misfolding) से ये डोपामिन-उत्पादक न्यूरॉन्स धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं या काम करना बंद कर देते हैं। जब मस्तिष्क में डोपामिन का स्तर लगभग 60 से 80 प्रतिशत तक गिर जाता है, तब पार्किंसंस के स्पष्ट मोटर (शारीरिक गति संबंधी) लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इसके अतिरिक्त, इस रोग में मस्तिष्क की कोशिकाओं में ‘लेवी बॉडीज़’ (Lewy Bodies) नामक असामान्य प्रोटीन (Alpha-synuclein) के गुच्छे भी जमा होने लगते हैं, जो मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को और अधिक बाधित करते हैं。
🔍 रोग के मुख्य लक्षण (Clinical Manifestations)
पार्किंसंस रोग के लक्षणों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है: मोटर लक्षण (Motor Symptoms) और नॉन-मोटर लक्षण (Non-Motor Symptoms)।
1. मोटर (गति संबंधी) लक्षण:
- हाथों और अंगों में कंपन (Tremors at rest): यह सबसे शुरुआती और आम लक्षण है। विश्राम की अवस्था में उंगलियों, हाथों, होठों या पैरों में अनियंत्रित कंपन होता है (जैसे उंगलियों के बीच कोई गोली घुमा रहे हों – Pill-rolling tremor)।
- मांसपेशियों में अत्यधिक जकड़न (Rigidity): शरीर की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं। हाथ-पैर मोड़ने में प्रतिरोध महसूस होता है (Cogwheel rigidity), जिससे दर्द और चलने-फिरने में भारी असुविधा होती है।
- गति का धीमा पड़ना (Bradykinesia): रोगी के दैनिक कार्य अत्यंत धीमे हो जाते हैं। कदम छोटे हो जाते हैं, कुर्सी से उठने या बिस्तर पर करवट लेने में भी बहुत समय और संघर्ष लगता है।
- संतुलन और मुद्रा में कमी (Postural Instability): खड़े होने की मुद्रा आगे की ओर झुक जाती है। शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है, जिससे रोगी के बार-बार गिरने (Falls) का जोखिम बहुत अधिक बढ़ जाता है।
- चेहरे के भावों का लुप्त होना (Masked Face): चेहरे की मांसपेशियों की गतिशीलता कम हो जाने के कारण, रोगी का चेहरा भावहीन सा लगने लगता है। पलकें झपकाना कम हो जाता है।
2. नॉन-मोटर (गैर-गति संबंधी) लक्षण:
अक्सर पार्किंसंस को केवल ‘कांपने वाली बीमारी’ समझा जाता है, जो कि एक बड़ी भूल है। पार्किंसंस मोटर लक्षणों के प्रकट होने से कई साल पहले ही नॉन-मोटर लक्षणों के रूप में संकेत देने लगता है:
- सूंघने की क्षमता का कम होना या पूरी तरह खत्म होना (Anosmia)।
- गंभीर कब्ज (Constipation) और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं।
- नींद संबंधी विकार (REM Sleep Behavior Disorder – नींद में हाथ-पैर चलाना या चिल्लाना)।
- गंभीर अवसाद (Depression), चिंता (Anxiety) और भावनात्मक शून्यता (Apathy)।
- स्मृति दोष और संज्ञानात्मक गिरावट (Cognitive decline/Dementia) जो रोग के अंतिम चरणों में देखी जाती है।
👉 निष्कर्ष: यह रोग केवल शारीरिक ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोगी के मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को भी गहराई से प्रभावित करता है। इसलिए इसका उपचार भी केवल शारीरिक नहीं हो सकता; इसके लिए ‘माइंड-बॉडी-स्पिरिट’ एप्रोच की आवश्यकता होती है。
📊 भारत और वैश्विक परिप्रेक्ष्य (Epidemiology and Social Impact)
- वैश्विक स्थिति: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, विश्वभर में न्यूरोलॉजिकल विकारों के कारण होने वाली मृत्यु और विकलांगता में पार्किंसंस रोग सबसे तेजी से बढ़ने वाली बीमारी है। वर्तमान में दुनिया भर में लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) से अधिक लोग इस बीमारी के साथ जी रहे हैं।
- भारत में स्थिति: भारत में, विशेषकर हमारी तेजी से वृद्ध होती आबादी (Aging Population) के कारण, इस रोग के मामलों में बहुत तेज वृद्धि देखी जा रही है। भारत में पार्किंसंस के रोगियों की संख्या का सटीक अनुमान लगाना कठिन है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी के कारण अक्सर इसे ‘बुढ़ापे का सामान्य लक्षण’ मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में पार्किंसंस के रोगियों की संख्या 10 लाख से अधिक हो सकती है और अगले कुछ दशकों में इसके दोगुने होने की आशंका है।
- सामाजिक और आर्थिक बोझ: यह बीमारी न केवल रोगी के लिए कष्टकारी है, बल्कि उनके परिवार और देखभाल करने वालों (Caregivers) पर भी भारी आर्थिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दबाव (Caregiver Burden) डालती है। लंबे समय तक चलने वाले उपचार और देखभाल का खर्च बहुत अधिक होता है।
👉 इसलिए, केवल दवा-आधारित उपचार (Medication-only approach) पर्याप्त नहीं है। दवाओं के अपने दुष्प्रभाव (Side-effects) होते हैं और समय के साथ उनकी प्रभावशीलता कम होने लगती है (Motor fluctuations & Dyskinesia)। यही वह बिंदु है जहाँ एक समग्र प्रबंधन (Holistic Management) प्रणाली अत्यंत आवश्यक हो जाती है。
🧘♂️ योग: तंत्रिका तंत्र को पुनः संतुलित करने का सशक्त माध्यम
यह स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए कि योग पार्किंसंस रोग को पूरी तरह “ठीक” (Cure) नहीं करता है, और न ही यह न्यूरॉन्स के नष्ट होने की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक सकता है। लेकिन, अनगिनत आधुनिक वैज्ञानिक शोध यह प्रमाणित कर चुके हैं कि नियमित योगाभ्यास लक्षण प्रबंधन (Symptom Management), शारीरिक लचीलेपन, और जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life) को सुधारने में एक अचूक ‘एडजंक्टिव थेरेपी’ (Adjunctive Therapy) है。
🧠 योग के गहन वैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल प्रभाव:
- न्यूरोप्लास्टिसिटी को बढ़ावा देना (Neuroplasticity Enhancement): न्यूरोप्लास्टिसिटी मस्तिष्क की वह क्षमता है जिसके द्वारा वह नए न्यूरल कनेक्शन (Neural pathways) बनाता है और स्वयं को पुनर्गठित करता है। योग का माइंडफुल (जागरूक) मूवमेंट मस्तिष्क को नए तरीके से काम करने के लिए प्रेरित करता है। इसके अभ्यास से मस्तिष्क में BDNF (Brain-Derived Neurotrophic Factor) नामक प्रोटीन का स्तर बढ़ता है, जो न्यूरॉन्स के जीवित रहने और उनके विकास में सहायता करता है। इससे रोगी के मोटर कंट्रोल में उल्लेखनीय सुधार देखा जाता है।
- संतुलन, समन्वय और प्रोप्रियोसेप्शन (Proprioception): पार्किंसंस के रोगियों को अक्सर यह महसूस नहीं होता कि उनका शरीर अंतरिक्ष (Space) में किस स्थिति में है (प्रोप्रियोसेप्शन की कमी)। योगासनों के निरंतर अभ्यास से ‘किनस्थेटिक अवेयरनेस’ (Kinesthetic Awareness – शरीर की गति की अनुभूति) में वृद्धि होती है। इससे रोगी के शरीर का संतुलन सुधरता है और ‘फ्रीजिंग ऑफ गैट’ (चलते-चलते अचानक पैरों का जम जाना) तथा गिरने (Falls) का जोखिम बहुत कम हो जाता है।
- तनाव और चिंता प्रबंधन (Autonomic Nervous System Regulation): तनाव पार्किंसंस के लक्षणों (विशेषकर कंपन और जकड़न) को तुरंत बढ़ा देता है। ध्यान और प्राणायाम का अभ्यास सीधे ‘सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम’ (तनाव प्रणाली) को शांत करता है और ‘पैरासिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम’ (विश्राम प्रणाली) को सक्रिय (Parasympathetic activation) करता है। इससे रक्त में कोर्टिसोल (Cortisol) का स्तर कम होता है, जो रोग की प्रगति को धीमा करने में परोक्ष रूप से सहायक है।
🧘 पार्किंसंस के रोगियों के लिए अनुशंसित और उपयोगी योग अभ्यास
(नोट: ये अभ्यास रोगी की क्षमता के अनुसार और एक प्रमाणित योग चिकित्सक/थेरेपिस्ट की देखरेख में ही किए जाने चाहिए। कई आसन कुर्सी पर बैठकर (Chair Yoga) भी किए जा सकते हैं।)
🔹 आसन (Asanas – शारीरिक मुद्राएं):
- ताड़ासन (Mountain Pose): यह आसन रीढ़ की हड्डी को सीधा करने, शरीर की मुद्रा (Posture) को सुधारने और संतुलन (Balance) स्थापित करने में अद्भुत है। यह ‘आगे की ओर झुकने वाली’ पार्किंसंस मुद्रा को ठीक करता है।
- वृक्षासन (Tree Pose): यह तंत्रिका और मांसपेशियों के बीच के समन्वय (Neuromuscular Coordination) को बढ़ाता है और एकाग्रता में सुधार करता है। (शुरुआत में दीवार के सहारे किया जा सकता है)।
- मार्जरी-बीटिलासन (Cat-Cow Pose): पार्किंसंस में रीढ़ की हड्डी बहुत सख्त (Rigid) हो जाती है। यह आसन पूरी रीढ़ की हड्डी में रक्त संचार और लचीलापन (Spine flexibility) बढ़ाता है।
- पश्चिमोत्तानासन / शशांकासन (Forward Bends): ये आसन तंत्रिका तंत्र को शीतलता प्रदान करते हैं, तनाव कम करते हैं (Relaxation) और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट की मालिश कर कब्ज से राहत दिलाते हैं।
🌬️ प्राणायाम (Pranayama – श्वास नियंत्रण):
- अनुलोम-विलोम (Alternate Nostril Breathing): यह मस्तिष्क के दाएं और बाएं गोलार्द्ध (Hemispheres) के बीच संतुलन स्थापित करता है। यह नाड़ियों की शुद्धि कर मानसिक स्पष्टता लाता है।
- भ्रामरी (Bee Breath): भ्रामरी प्राणायाम के दौरान उत्पन्न होने वाला नाद (Vibration) ‘वेगस नर्व’ (Vagus Nerve) को सीधे तौर पर उत्तेजित करता है, जिससे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र को गहन शांति (Nervous system calming) मिलती है। यह एंग्जायटी दूर करने का अचूक उपाय है।
- दीर्घ श्वसन (Deep / Diaphragmatic Breathing): यह फेफड़ों की वाइटल कैपेसिटी (Vital capacity) को बढ़ाता है, जो पार्किंसंस के रोगियों में अक्सर कम हो जाती है। शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह सुधरने से ऊर्जा का स्तर बढ़ता है।
🧘 ध्यान और शिथिलीकरण (Meditation & Relaxation):
- माइंडफुलनेस मेडिटेशन (Mindfulness): वर्तमान क्षण में जागरूक रहने का अभ्यास रोगी को अवसाद और बीमारी के प्रति नकारात्मक विचारों से दूर रखता है। यह एमिग्डाला (मस्तिष्क का भय केंद्र) को शांत करता है।
- योग निद्रा (Yoga Nidra): पार्किंसंस के रोगियों को अक्सर गहरी नींद नहीं आती। योग निद्रा का 30 मिनट का अभ्यास उन्हें गहन विश्राम और ‘सचेत नींद’ का अनुभव कराता है, जिससे शरीर अपनी आंतरिक स्व-चिकित्सा (Healing) प्रक्रिया शुरू कर पाता है।
🌿 आयुर्वेद: ‘कम्पवात’ और वात दोष संतुलन का प्राचीन दृष्टिकोण
आयुर्वेद, जो जीवन का एक संपूर्ण विज्ञान है, रोग को केवल लक्षणों के समूह के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के असंतुलन के रूप में समझता है।
आयुर्वेदिक संहिताओं (जैसे चरक संहिता और माधव निदान) में पार्किंसंस रोग से मिलते-जुलते लक्षणों का वर्णन “कम्पवात” (Kampavata) या “वेपथु” (Vepathu) के नाम से मिलता है।
🔬 कम्पवात के आयुर्वेदिक सिद्धांत (Pathogenesis):
- वात दोष की वृद्धि: आयुर्वेद के अनुसार, जब शरीर में प्राकृतिक रूप से वात दोष (जो वायु और आकाश तत्वों से बना है और शरीर की सभी गतियों के लिए उत्तरदायी है) अत्यंत कुपित या असंतुलित हो जाता है, तो यह ‘कम्पवात’ को जन्म देता है। बुढ़ापा (वृद्धावस्था) स्वाभाविक रूप से वात के प्रकोप का काल होता है।
- तंत्रिका तंत्र (मज्जा धातु) में असंतुलन: कुपित वात दोष जब शरीर के स्रोतों (Channels) को सुखा देता है और ‘मज्जा धातु’ (Nervous system & Bone marrow) में प्रवेश कर उसे प्रभावित करता है, तब झटके आना, अंगों का कांपना, जकड़न और रूखापन (Dryness) जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं।
- अग्निमांद्य और आम (Impaired Digestion & Toxins): आयुर्वेद यह भी मानता है कि कमजोर पाचन अग्नि के कारण शरीर में ‘आम’ (Toxins) बनता है, जो नाड़ियों में अवरोध पैदा करता है। आधुनिक विज्ञान भी अब पार्किंसंस के मामले में ‘गट-ब्रेन एक्सिस’ (Gut-Brain Axis) की बात कर रहा है कि बीमारी की शुरुआत शायद आंतों (Gut) से होती है।
🌱 संभावित आयुर्वेदिक सहयोग एवं औषधियां (विशेषज्ञ की देखरेख में)
आधुनिक एलोपैथिक दवाओं (जैसे Levodopa/Carbidopa) के साथ एक आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की देखरेख में कुछ विशिष्ट जड़ी-बूटियों का प्रयोग अत्यंत लाभकारी (Neuroprotective) सिद्ध हुआ है:
- कपिकच्छु (Mucuna pruriens – कौंच बीज): यह आयुर्वेद में पार्किंसंस के लिए सबसे विख्यात औषधि है। वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि कौंच के बीज ‘एल-डोपा’ (L-Dopa) का एक बेहतरीन और प्राकृतिक स्रोत हैं। यह सिंथेटिक दवाओं की तुलना में रक्त-मस्तिष्क बाधा (Blood-Brain Barrier) को अधिक सुगमता से पार करता है और इसके ‘डिसकिनेसिया’ (Dyskinesia) जैसे दुष्प्रभाव भी बहुत कम होते हैं।
- अश्वगंधा (Withania somnifera): यह एक शक्तिशाली ‘अडैप्टोजेन’ (Adaptogen) है। यह न केवल तनाव और चिंता को कम करता है, बल्कि तंत्रिकाओं का पोषण कर मज्जा धातु को बल प्रदान करता है। यह मांसपेशियों की जकड़न को कम करने में भी सहायक है।
- ब्राह्मी (Bacopa monnieri) और शंखपुष्पी: ये मेध्य रसायन (Nootropics) हैं जो मस्तिष्क की कार्यप्रणाली का समर्थन करते हैं। पार्किंसंस में होने वाली स्मृति हानि (Cognitive decline) और अवसाद को रोकने में इनका प्रयोग विशेष लाभकारी है।
- पंचकर्म चिकित्सा (Panchakarma): वात शमन के लिए ‘बस्ति’ (Medicinal Enema), ‘अभ्यंग’ (औषधीय तेलों से मालिश), ‘शिरोधारा’, और ‘नस्य’ (नाक में औषधीय तेल डालना) जैसी शुद्धिकरण प्रक्रियाएं शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने और तंत्रिका तंत्र को चिकनाई व पोषण देने में अत्यंत प्रभावी हैं।
👉 विशेष चेतावनी: ये सभी औषधियां और प्रक्रियाएं निश्चित रूप से सहायक हो सकती हैं, लेकिन किसी भी रोगी को अपनी चल रही एलोपैथिक दवाओं को बंद नहीं करना चाहिए। आयुर्वेदिक दवाओं का प्रयोग हमेशा एक योग्य और अनुभवी नाड़ी वैद्य या आयुर्वेदिक चिकित्सक (Ayurvedic Physician) के परामर्श से ही किया जाना चाहिए।
💧 प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) की जीवनदायिनी भूमिका
प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) का मूल सिद्धांत यह है कि मानव शरीर में स्वयं को ठीक करने की एक अंतर्निहित शक्ति (Vital Force / Prana) मौजूद है। प्राकृतिक चिकित्सा पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के उपयोग से शरीर के भीतर मौजूद विषाक्त पदार्थों (Morbid matter) को बाहर निकाल कर इस ‘स्व-चिकित्सा क्षमता’ (Self-healing mechanism) को सक्रिय करने पर आधारित है。
पार्किंसंस के प्रबंधन में प्राकृतिक चिकित्सा की जीवनशैली में किए गए बदलाव जादुई असर दिखाते हैं:
🟢 प्रमुख प्राकृतिक चिकित्सा उपाय:
- जल चिकित्सा (Hydrotherapy): गर्म पानी के टब में स्नान (Warm water immersion) या रीढ़ की हड्डी पर गर्म-ठंडी पट्टियों का प्रयोग (Spinal spray)। यह तंत्रिका तंत्र को तुरंत आराम पहुँचाता है, मांसपेशियों की गहरी जकड़न को कम करता है और शरीर में रक्त संचार (Blood circulation) को सुचारू करता है।
- सूर्य स्नान (Sun Therapy – Heliotherapy): सूर्य का प्रकाश सीधे तौर पर मेलेनिन और मस्तिष्क के रसायनों को प्रभावित करता है। आधुनिक शोध बताते हैं कि विटामिन डी (Vitamin D) की कमी का पार्किंसंस से गहरा संबंध है। सुबह के समय 20-30 मिनट का सूर्य स्नान तंत्रिकाओं को प्राकृतिक ऊर्जा (Neuroprotection) प्रदान करता है और नींद के चक्र (Circadian rhythm) को ठीक करता है।
- मालिश चिकित्सा (Massage Therapy): शरीर पर औषधीय तेलों या प्राकृतिक तेलों (तिल या जैतून) से की गई वैज्ञानिक मालिश, मांसपेशियों के कड़ेपन (Spasticity) को खोलती है। इसके साथ ही एक्यूप्रेशर (Acupressure) और रिफ्लेक्सोलॉजी नर्व-एंडिंग्स को स्टिमुलेट करती हैं।
- मिट्टी चिकित्सा (Mud Therapy): पेट पर मिट्टी की पट्टी (Mud pack) रखने से आंतों की गर्मी शांत होती है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, पार्किंसंस में कब्ज एक बड़ी समस्या है; मिट्टी चिकित्सा आंतों की पेरिस्टाल्टिक गति को सुधार कर पाचन तंत्र को दुरुस्त करती है, जिससे शरीर का ‘गट-ब्रेन एक्सिस’ मजबूत होता है।
- आहार चिकित्सा (Dietary Intervention): प्राकृतिक चिकित्सआपको यह भी पढ़ना चाहिए : विश्व पार्किंसंस दिवस: योग और आयुर्वेद से समग्र प्रबंधन | आयुष्य पथ

