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फलों को पकाने में ‘कैल्शियम कार्बाइड’ पर FSSAI की सख्त कार्रवाई

📰 आयुष्य पथ न्यूज़ : विशेष रिपोर्ट

फलों को पकाने में ‘कैल्शियम कार्बाइड’ पर सख्त कार्रवाई: FSSAI का बड़ा निर्देश, देशभर में छापेमारी तेज

नई दिल्ली/भारत। गर्मियों की शुरुआत के साथ ही बाजारों में आम, पपीता और केले जैसे फलों की आवक बढ़ गई है। लेकिन क्या जो फल आप अपने परिवार को सेहतमंद बनाने के लिए खिला रहे हैं, वे वास्तव में सुरक्षित हैं? इसी चिंता को गंभीरता से लेते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने फलों को कृत्रिम रूप से पकाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे खतरनाक रसायनों पर अब अपनी सख्ती तेज कर दी है।

FSSAI ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्पष्ट और कड़े निर्देश जारी किए हैं कि ‘कैल्शियम कार्बाइड’ (Calcium Carbide) के उपयोग पर पूरी तरह से रोक सुनिश्चित की जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ तुरंत दंडात्मक कार्रवाई हो।

🔴 क्या है पूरा मामला?

बाजारों में फलों को जल्दी पकाने और उन्हें कृत्रिम रूप से आकर्षक बनाने के लिए कई व्यापारी ‘कैल्शियम कार्बाइड’ का धड़ल्ले से उपयोग कर रहे हैं। इसे आम बोलचाल की भाषा में ‘मसाला’ भी कहा जाता है। FSSAI ने इस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए देशभर की फल मंडियों, गोदामों और पूरी सप्लाई चेन पर निगरानी बढ़ाने के आदेश दिए हैं।

नियामक संस्था ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है:

  • छापेमारी और निरीक्षण: सभी राज्यों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों को फल मंडियों और गोदामों में सघन जांच अभियान चलाने होंगे।
  • कड़ी कानूनी कार्रवाई: जो भी फल व्यापारी, सप्लायर या विक्रेता इस प्रतिबंधित रसायन का उपयोग करता पाया जाएगा, उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

⚠️ क्यों इतना खतरनाक है कैल्शियम कार्बाइड?

विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के अनुसार, जब कैल्शियम कार्बाइड नमी के संपर्क में आता है, तो यह ‘एसिटिलीन गैस’ (Acetylene gas) पैदा करता है। समस्या सिर्फ इस गैस से नहीं है, बल्कि कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे अत्यधिक जहरीले तत्वों के अंश पाए जाते हैं।

जब फल इस रसायन से पकाए जाते हैं, तो ये जहर फल के अंदर तक प्रवेश कर जाते हैं। इसके गंभीर दुष्प्रभाव इस प्रकार हैं:

  • तात्कालिक लक्षण: सिरदर्द, तेज चक्कर आना, और शरीर में भारी कमजोरी महसूस होना।
  • पाचन तंत्र पर असर: उल्टी आना, पेट में तेज जलन, दस्त और अन्य गैस्ट्रिक समस्याएं।
  • गंभीर खतरे: लंबे समय तक ऐसे फलों का सेवन करने से नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) को भारी नुकसान पहुंच सकता है और यह शरीर में कैंसर (Carcinogenic) का कारण भी बन सकता है।

📜 क्या कहते हैं खाद्य सुरक्षा के नियम?

भारत में कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग खाद्य पदार्थों के लिए पूरी तरह से गैर-कानूनी है। Food Safety and Standards (Prohibition and Restrictions on Sales) Regulations, 2011 के तहत:

“कोई भी व्यक्ति ऐसे फलों की बिक्री, या बिक्री के लिए भंडारण नहीं कर सकता, जिन्हें कार्बाइड गैस (एसिटिलीन) के उपयोग से कृत्रिम रूप से पकाया गया हो।”

🧪 अब मौके पर ही होगी पहचान

व्यापारियों की चालाकी पकड़ने के लिए FSSAI ने एक नई और कारगर पहल की है। प्राधिकरण ने अधिकारियों को “Strip Paper Test” (स्ट्रिप पेपर टेस्ट) का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं। इस साधारण लेकिन प्रभावी टेस्ट के जरिए अब मंडियों और बाजारों में ही तुरंत यह पता लगाया जा सकेगा कि फलों को कृत्रिम रसायनों से पकाया गया है या नहीं।

✅ तो सुरक्षित विकल्प क्या है?

फलों को पकाने की व्यावसायिक आवश्यकता को समझते हुए, FSSAI ने एथिलीन गैस (Ethylene gas) को एक सुरक्षित और स्वीकृत विकल्प माना है। एथिलीन एक प्राकृतिक पादप हार्मोन (Plant Hormone) की तरह काम करता है, जो फलों को प्राकृतिक रूप से पकाने की प्रक्रिया को तेज करता है। बशर्ते, इसका उपयोग तय मानकों और नियंत्रित मात्रा (Concentration) में ही किया जाए।

🧘‍♂️ आयुष्य पथ का स्वास्थ्य दृष्टिकोण (Health Insight)

प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार, भोजन की ‘प्राकृतिकता’ (Prakritikta) ही उत्तम स्वास्थ्य का मूल आधार है। जब हम रसायनों से पके फल खाते हैं, तो यह हमारे शरीर में क्या प्रभाव डालता है?

  • ‘आम’ (Toxins) की वृद्धि: ऐसे फल शरीर में ‘आम’ (विषाक्त तत्वों) को बढ़ाते हैं, जो कई बीमारियों की जड़ है।
  • जठराग्नि पर प्रहार: ये रसायन हमारी जठराग्नि (Digestive Fire) को मंद कर देते हैं, जिससे मेटाबॉलिज्म बुरी तरह प्रभावित होता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य: रासायनिक तत्वों का सीधा असर हमारे न्यूरोलॉजिकल सिस्टम पर पड़ता है, जिससे मानसिक थकावट और तनाव बढ़ता है।

🛑 उपभोक्ताओं के लिए विशेष सावधानी

जागरूकता ही बचाव है। अगली बार फल खरीदते समय इन बातों का ध्यान रखें:

  1. रंग का धोखा: जो फल बाहर से बहुत ज्यादा चमकीले और पूरी तरह एकसमान रंग के दिखें (जैसे एकदम पीला केला जिसमें हरे रंग का कोई धब्बा न हो), उनसे सावधान रहें। प्राकृतिक रूप से पके फलों का रंग अक्सर एकसमान नहीं होता।
  2. सुगंध की पहचान: प्राकृतिक रूप से पके फलों में एक मनमोहक, भीनी-भीनी सुगंध होती है। रसायन से पके फलों में यह प्राकृतिक महक नहीं होती।
  3. स्वाद और गंध: यदि फल काटने पर अजीब सी रासायनिक गंध आए या स्वाद असामान्य लगे, तो उसका सेवन तुरंत रोक दें।

📌 निष्कर्ष

FSSAI का यह कदम देश में खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने और नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करने की दिशा में एक बहुत बड़ा और सराहनीय प्रयास है। हालांकि, केवल सरकारी तंत्र की कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है। एक जागरूक और सतर्क उपभोक्ता ही अपने परिवार का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।

“प्राकृतिक खाएं, स्वस्थ रहें” — आयुष्य मन्दिरम् 🌿

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