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विटामिन D की गोलियां या धूप स्नान: हम प्रकृति से इतना दूर क्यों हो गए?

सर्दियों की गुनगुनी धूप में बैठना कभी भारतीय परिवारों की दिनचर्या का एक अनिवार्य हिस्सा था। घर के बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं छतों पर बैठकर तेल मालिश करवाते और मूंगफली खाते दिख जाते थे। लेकिन आज यह दृश्य ‘लग्जरी’ बन गया है। हम बंद कमरों में, हीटर के सामने बैठकर विटामिन D और कैल्शियम के महंगे सप्लीमेंट्स (Supplements) खा रहे हैं, जबकि सेहत का सबसे बड़ा और मुफ्त स्रोत हमारी खिड़की के ठीक बाहर दस्तक दे रहा है।

फार्मेसी बनाम प्रकृति प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) का सीधा सिद्धांत है— “रोग वही पनपता है जहाँ प्रकृति का अभाव है।” सूर्य केवल रोशनी का गोला नहीं है, यह ‘प्राण शक्ति’ है। आधुनिक विज्ञान भी अब मानता है कि धूप स्नान (Sun Bathing) केवल हड्डियों को मजबूत नहीं करता, बल्कि यह हमारे ‘सर्कैडियन रिदम’ (Circadian Rhythm) को सेट करता है, जिससे नींद अच्छी आती है और डिप्रेशन दूर होता है।

जीवनशैली में सुधार की जरूरत क्या हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि हमारे पास खुद को रिचार्ज करने के लिए 20 मिनट नहीं हैं? ‘आयुष्य पथ’ का स्पष्ट मानना है कि स्वास्थ्य किसी मल्टी-विटामिन की शीशी में नहीं, बल्कि प्रकृति के सानिध्य में है। इस सर्दी, अपने डॉक्टर खुद बनें। दवाइयां थोड़ी कम करें और धूप थोड़ी ज्यादा लें। प्रकृति की ओर लौटना ही असली बुद्धिमानी है।

— जयप्रकाश (संपादक, आयुष्य पथ)

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