भारत में ‘दिमेंशिया’ की आहट: 40 की उम्र में ही भूलने लगी यादें, 2036 तक दोगुने हो जाएंगे मरीज | Special Report
भारत में ‘दिमेंशिया’ की आहट: 40 की उम्र में ही भूलने लगी यादें, 2036 तक दोगुने हो जाएंगे मरीज
नई दिल्ली | आयुष्य पथ स्पेशल रिपोर्ट (09 जनवरी 2026)भारत एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसकी आहट अभी धीमी है लेकिन प्रभाव भयावह हो सकता है। यह संकट है—दिमेंशिया (Dementia)। आम भाषा में इसे ‘भूलने की बीमारी’ कहा जाता है, लेकिन यह याददाश्त खोने से कहीं अधिक है।
चिंताजनक बात यह है कि अब यह बीमारी केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही। भारत में ‘यंग ऑनसेट दिमेंशिया’ (Young Onset Dementia) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जहां 40 से 50 वर्ष की उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
(वर्तमान में यह संख्या 8.8 मिलियन है)
परिवारों पर टूटता ‘इमोशनल पहाड़’
दिमेंशिया केवल मरीज को नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार को तोड़ देता है। भारत में जहां ‘केयर होम्स’ की संस्कृति कम है, वहां देखभाल की जिम्मेदारी परिवार (विशेषकर महिलाओं) पर आती है।
- केयरगिवर बर्नआउट (Caregiver Burnout): 24 घंटे देखभाल करने वाले परिजन शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाते हैं।
- अपराधबोध (Guilt): देखभाल में थोड़ी सी भी कमी होने पर परिजनों को ग्लानि महसूस होती है।
- आर्थिक बोझ: दिमेंशिया का इलाज और देखभाल महंगी है, जिससे मध्यम वर्गीय परिवारों की आर्थिक रीढ़ टूट रही है।
विशेषज्ञों की राय: ‘जीवनशैली ही बचाव है’
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि दिमेंशिया का कोई पक्का इलाज (Cure) अभी उपलब्ध नहीं है, इसलिए रोकथाम (Prevention) ही एकमात्र उपाय है।
क्या करें?
- शुरुआती निदान: याददाश्त में हल्की गड़बड़ी को ‘बुढ़ापे की निशानी’ मानकर नजरअंदाज न करें। तुरंत डॉक्टर से मिलें।
- मानसिक व्यायाम: पहेलियाँ सुलझाना, नई भाषा सीखना या शतरंज खेलना।
- आयुष उपाय: योग, ध्यान और ब्राह्मी/शंखपुष्पी जैसी जड़ी-बूटियां मस्तिष्क की नसों को सक्रिय रखने में मदद कर सकती हैं।
- सामाजिक जुड़ाव: अकेलेपन से बचें, लोगों से मिलते-जुलते रहें।
विशेषज्ञों ने सरकार से ‘दिमेंशिया केयर’ के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा और नेशनल पॉलिसी बनाने की भी मांग की है, ताकि आने वाले समय में इस ‘सुनामी’ का सामना किया जा सके।
(स्रोत: Indian Express हेल्थ रिपोर्ट्स एवं मेडिकल जर्नल अपडेट्स – जनवरी 2026)

