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भारत में ‘मौत के आंकड़ों’ का संकट: 5 में से 4 मौतों की वजह का कोई रिकॉर्ड नहीं, कैसे बनेगी सही हेल्थ पॉलिसी?

भारत में ‘मौत के आंकड़ों’ का संकट: 5 में से 4 मौतों की वजह का कोई रिकॉर्ड नहीं, कैसे बनेगी सही हेल्थ पॉलिसी? | Ayushya Path

भारत में ‘मौत के आंकड़ों’ का संकट: 5 में से 4 मौतों की वजह का कोई रिकॉर्ड नहीं, कैसे बनेगी सही हेल्थ पॉलिसी?

किसी देश की स्वास्थ्य नीति (Health Policy) कितनी सफल होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश के पास बीमारियों और मौतों का डेटा कितना सटीक है। लेकिन भारत के संदर्भ में एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ (Scientific Reports) जर्नल में 3 जनवरी 2026 को प्रकाशित एक अध्ययन ने भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की एक बड़ी खामी को उजागर किया है।

अध्ययन के अनुसार, भारत में मरने वाले लोगों में से अधिकांश के मौत के असली कारण का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड ही नहीं है।

केवल 22.5% मौतों का कारण ‘मेडिकली सर्टिफाइड’ (Doctor Certified) है।
यानी 5 में से 4 मौतें बिना डॉक्टरी प्रमाणन के दर्ज हो रही हैं।

अध्ययन के 3 बड़े खुलासे

शोधकर्ताओं ने 15 वर्षों (2006-2020) के डेटा का विश्लेषण किया और पाया कि स्थिति में सुधार की गति बेहद धीमी है।

  • धीमी प्रगति: पिछले एक दशक में MCCD (Medical Certification of Cause of Death) की दर में महज 2.5% की वृद्धि हुई है।
  • ग्रामीण भारत अदृश्य है: अधिकांश प्रमाणित मौतें शहरों के बड़े अस्पतालों की हैं। ग्रामीण इलाकों में, जहाँ लोग अक्सर घर पर या अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ देते हैं (Non-institutional deaths), वहाँ मौत का कारण ‘अज्ञात’ या ‘हार्ट फेलियर’ लिखकर छोड़ दिया जाता है, बिना किसी वैज्ञानिक आधार के।
  • क्षेत्रीय असमानता:
    👉 उत्तर भारत (बिहार, यूपी आदि): यहाँ स्थिति सबसे खराब है। MCCD दर औसतन 18% है। यहाँ डॉक्टरों की भारी कमी है।
    👉 गोवा और मणिपुर: यहाँ लगभग 100% मौतें मेडिकली सर्टिफाइड हो रही हैं।

यह ‘डेटा गैप’ आपके लिए क्यों खतरनाक है?

जब सरकार को यह पता ही नहीं होगा कि लोग किस बीमारी से मर रहे हैं, तो वे संसाधन कैसे आवंटित करेंगे?

  1. गलत संसाधन आवंटन: अगर रिकॉर्ड में हृदय रोग से मौतें कम दर्ज हैं (क्योंकि वे घर पर हुईं), तो सरकार कार्डियक केयर पर कम बजट खर्च करेगी, जबकि वास्तविकता में यह मौत का बड़ा कारण हो सकता है।
  2. महामारी की अनदेखी: किसी नए वायरस या संक्रमण से होने वाली मौतों की पहचान शुरू में नहीं हो पाएगी।
  3. पॉलिसी का फेल होना: कैंसर, टीबी या श्वसन रोगों की वास्तविक संख्या न पता होने से नीतियां हवा में बनेंगी।

विशेषज्ञों की राय

IMA के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल के अनुसार, “मौत के कारणों का पता न चलने से रोगों की व्यापकता (Prevalence) का सही आकलन नहीं हो पाता। हमें ग्रामीण स्तर पर ‘वर्बल ऑटॉप्सी’ (परिजनों से पूछताछ कर कारण जानना) और डिजिटल रिपोर्टिंग को बढ़ाना होगा।”

निष्कर्ष: भारत को ‘विकसित भारत’ बनने के लिए अपनी डेटा प्रणाली को सुधारना होगा। जब तक हर मौत का कारण वैज्ञानिक रूप से दर्ज नहीं होगा, तब तक हम अंधेरे में तीर चलाते रहेंगे।

(स्रोत: Scientific Reports जर्नल, 3 जनवरी 2026 – “A retrospective cluster analysis…” & मीडिया रिपोर्ट्स)

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