Editor's Pick

‘बलिवैश्व यज्ञ’: उपभोक्तावाद के दौर में ‘वैदिक इकोलॉजी’ का शंखनाद


आचार्य डॉ. जयप्रकाशानन्द। आयुष्य मन्दिरम्

इस गहरे संकट के दौर में, भारतीय ऋषियों द्वारा प्रतिपादित ‘बलिवैश्व यज्ञ’ (पंच महायज्ञों में से एक) केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सशक्त ‘वैज्ञानिक अनिवार्यता’ और ‘पारिस्थितिक संजीवनी’ के रूप में उभरता है।

इक्कीसवीं सदी का मानव विकास के उस शिखर पर खड़ा है, जहाँ उसके एक हाथ में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) है और दूसरे हाथ में मंगल ग्रह तक पहुँचने की क्षमता। लेकिन, इस अभूतपूर्व तकनीकी छलांग के बीच, हमने अपने पैरों तले की उस जमीन को खोखला कर दिया है, जिस पर हमारा अस्तित्व टिका है। जलवायु परिवर्तन, लुप्त होती जैव विविधता और संसाधनों की अंधाधुंध लूट—ये आधुनिक सभ्यता के माथे पर लगे वो कलंक हैं, जो चीख-चीख कर कह रहे हैं कि हमारा प्रकृति से संबंध टूट चुका है।

आधुनिक समाज का मूल मंत्र बन चुका है—’उपभोग करो’। इसके विपरीत, बलिवैश्व यज्ञ का उद्घोष है—’त्यागपूर्वक भोग करो’ (तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा)।

बलिवैश्व यज्ञ का मूल दर्शन अत्यंत वैज्ञानिक है। यह इस ब्रह्मांडीय सत्य को स्वीकार करता है कि मनुष्य इस धरती का ‘मालिक’ नहीं, बल्कि एक ‘हिस्सेदार’ मात्र है। हम जो अन्न ग्रहण करते हैं, जल पीते हैं और वायु में श्वास लेते हैं, उस पर केवल हमारा अधिकार नहीं है। इस पूरी प्रक्रिया में दृश्य और अदृश्य, सूक्ष्म से लेकर विशालकाय तक, अनगिनत जीवों का योगदान है। खेत की मिट्टी को उपजाऊ बनाने वाले केंचुए से लेकर, परागण (pollination) करने वाली मधुमक्खियों तक, और पर्यावरण को संतुलित रखने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं तक—हम सबके ऋणी हैं।

भोजन ग्रहण करने से पूर्व उसका एक अंश अग्नि, वायु, जल और विभिन्न प्राणियों (चींटी, पक्षी, श्वान आदि) के लिए समर्पित करना, ‘बलिवैश्व यज्ञ’ कहलाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो यह ‘सूक्ष्म स्तरीय पारिस्थितिकी प्रबंधन’ (Micro-level Ecological Management) का एक अद्भुत उदाहरण है।

पहला, जब हम भोजन का अंश चींटियों, पक्षियों या अन्य जीवों को देते हैं, तो हम अनजाने में ही ‘खाद्य श्रृंखला’ (Food Chain) के निचले और मध्यम स्तरों को सुदृढ़ कर रहे होते हैं। एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए इन जीवों का जीवित रहना अनिवार्य है।

दूसरा, यह प्रक्रिया हमें ‘माइंडफुल ईटिंग’ (सचेत भोजन) सिखाती है। जब व्यक्ति को पता होता है कि उसे अपने भोजन में से पहले दूसरों का हिस्सा निकालना है, तो उसके भीतर अन्न के प्रति सम्मान जागृत होता है। यह आज की ‘फूड वेस्टेज’ (भोजन बर्बादी) की वैश्विक समस्या का एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक समाधान है। यह मनुष्य के अहंकार को तोड़ता है और उसे ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विराट दर्शन से जोड़ता है।

आज का मानव ‘मैं’ और ‘मेरा’ के संकुचित दायरे में सिमट गया है। यह संकीर्णता ही तनाव, अवसाद और अकेलेपन की जड़ है। बलिवैश्व यज्ञ हमें ‘समष्टि’ (Collective) से जोड़ता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व अकेले संभव नहीं है।

यह विडंबना है कि हम ‘वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे’ पर सोशल मीडिया पोस्ट लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं, जबकि हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण संरक्षण को दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बना दिया था। बलिवैश्व यज्ञ, दैनिक जीवन में ‘एप्लाइड इकोलॉजी’ (Applied Ecology) का सबसे व्यावहारिक रूप है।

समय आ गया है कि हम बलिवैश्व यज्ञ को रूढ़िवादी चश्मे से देखना बंद करें। यह किसी संप्रदाय विशेष का कर्मकांड नहीं, बल्कि धरती पर जीवन के अस्तित्व को बनाए रखने का एक सार्वभौमिक विज्ञान है। आधुनिक युग में इसकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है, क्योंकि अब प्रश्न केवल मोक्ष का नहीं, बल्कि इस ग्रह पर हमारे अस्तित्व के बचे रहने का है।

हमें अपनी रसोई को पुनः यज्ञशाला बनाना होगा, जहाँ भोजन केवल पेट भरने का साधन न हो, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के प्रति कृतज्ञता का एक अनुष्ठान बने।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *