डिजाइनर राइस: डायबिटीज और कुपोषण के खिलाफ भारत की नई क्रांति

आयुष्य पथ – कृषि एवं स्वास्थ्य तकनीक
विशेष रिपोर्ट: पोषण क्रांति 2026
डायबिटीज और कुपोषण पर अंतिम प्रहार: CSIR-NIIST ने विकसित किया ‘डिजाइनर राइस’ – तीन गुना प्रोटीन और लो-जीआई का अनूठा संगम
तिरुवनंतपुरम | 11 मार्च, 2026 | रिपोर्ट: आयुष्य पथ डेस्क
तिरुवनंतपुरम: भारत में डायबिटीज और कुपोषण की दोहरी चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने एक अभूतपूर्व हथियार तैयार किया है। CSIR-National Institute for Interdisciplinary Science and Technology (CSIR-NIIST) ने एक नई चावल की किस्म विकसित की है, जिसे ‘डिजाइनर राइस’ कहा जा रहा है। यह चावल न केवल तीन गुना अधिक प्रोटीन से भरपूर है, बल्कि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) भी बेहद कम है।
| पोषक तत्व / विशेषता | सामान्य सफेद चावल | डिजाइनर राइस (Designer Rice) |
|---|---|---|
| प्रोटीन (प्रति 100g) | 6-7 ग्राम | 18-21 ग्राम |
| ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) | 70-89 (High) | 42-55 (Low) |
| अन्य खनिज | न्यूनतम | आयरन, जिंक और फाइबर (+30-50%) |
डायबिटीज मरीजों के लिए ‘दवा’ के समान
भारत में 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से प्रभावित हैं। ‘डिजाइनर राइस’ का कम GI होने के कारण खाने के बाद ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता (No Glucose Spike)। इससे इंसुलिन की आवश्यकता कम होती है और लंबे समय तक भूख का अहसास नहीं होता। डॉ. सी. आनंदहरामकृष्णन (निदेशक, NIIST) के अनुसार, यह चावल स्वाद बदले बिना डायबिटीज प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।
कुपोषण के खिलाफ ‘प्रोटीन हथियार’
NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि देश में 35% बच्चे स्टंटेड हैं और 67% महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं। दाल और मांस के महंगे होने के कारण ग्रामीण आबादी में प्रोटीन की भारी कमी रहती है। यह चावल दाल-चावल की पारंपरिक थाली को और भी शक्तिशाली बनाएगा और बच्चों व गर्भवती महिलाओं के पोषण स्तर को सुधारेगा।
🧘♀️ आयुष्य मन्दिरम् – स्वास्थ्य जीवनशैली टिप:
“चावल को विलेन समझने की जरूरत नहीं है, बस सही चुनाव महत्वपूर्ण है। जब तक यह नई किस्म उपलब्ध नहीं होती, तब तक सामान्य चावल के साथ प्रचुर मात्रा में हरी सब्जियां और प्रोटीन (जैसे पनीर या दाल) का समावेश करें ताकि उसका ओवरऑल GI कम बना रहे।”
उपलब्धता और भविष्य की राह
वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि अगले 12-18 महीनों में यह बीज किसानों तक पहुँच जाए। पहले चरण में दक्षिण भारतीय राज्यों (केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश) को प्राथमिकता दी जा रही है। हालांकि, प्रति हेक्टेयर पैदावार को सामान्य चावल के बराबर लाना और व्यापक वितरण अभी भी एक चुनौती है।
“हमारा पारंपरिक भोजन ही हमारी सबसे बड़ी दवा है, बशर्ते हम उसे सही तरीके से डिजाइन करें।”
यह समाचार केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी नई किस्म के चावल या आहार योजना को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ (Nutritionist) से सलाह अवश्य लें, विशेषकर यदि आप गंभीर डायबिटीज के मरीज हैं।

